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मार्च, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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 मेरी ख़्वाहिशों का आसमान  कभी खतम नहीं होता और मैं उड़ते -उड़ते थक जाती हूँ ।
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1  मेरी दुश्मनी उसके ख़यालातों से थी, जब से बदले हैं उसने मेरा मित्र हो गया है । २ ये एक नज़रिया ही तो है कि एक व्यक्ति के लिए कोई तो जान देने को तैयार रहता है और कोई उसी व्यक्ति की जान लेने को आतुर रहता है ।

स्वरचित (quote)

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" दृष्टि ईर्ष्या और नफ़रत से भरी हो तो अच्छे मनुष्य की अच्छाई में भी बुराई का अहसास होता है और प्रेम  व अपनत्व से युक्त हो तो बुरे इंसान में भी हज़ार अच्छाईयां नज़र आ जाती हैं" - अंशु चौहान 

नवरात्रि संकल्प

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साल में दो प्रमुख नवरात्रे आते हैं । इन नवरात्रों में हमें ये संकल्प लेना चाहिए कि हमारा हर कर्म  माँ दुर्गा की भक्ति में लीन रहते हुए उच्च और पवित्र हो । माँ दुर्गा की भक्ति हम अपनी असीमित कामनाओं की पूर्ति या स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं करें वरन मन मस्तिष्क को पवित्र रखते हुए ऐसे कर्म करने के लिए करें जिनसे दूसरों का भी भला हो और स्वं  को मानसिक शांति का अनुभव हो । वैसे तो माँ की भक्ति ही अपने -आप में एक बहुत बड़े आनंद का अनुभव है । माँ की पूजा के इन दिनों में हमे अपने अंदर इतनी सात्विक शक्तियाँ पैदा कर लेनी चाहिए कि सम्पूर्ण वर्ष उनका संग्रह खत्म न हो । कन्या से लेकर बुजुर्ग महिला तक हर अवस्था की स्त्री के प्रति हमारा मन निर्मल और श्रद्धा से पूर्ण हो । हम सभी को पवित्र दृष्टि से देखें ।  यही पवित्रता हर  स्त्री के विचारों में भी होनी चाहिए । माँ की भक्ति का ये पर्व तभी सम्पूर्ण और सार्थक होगा जब हर व्यक्ति पवित्र मन और स्व -भाव से ऊपर उठ कर इसे मनाए ।कई कलुषित मन के लोग नवरात्रे जैसे पावन पर्व में भी छोटी-छोटी अबोध कन्याओं के साथ दुराचा...

स्वरचित शेर(बदले लिबास...)

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"बदले लिबास  में आज पुराने चेहरे नज़र आए सीख तहज़ीब  की देने वाले बेतहज़ीब नज़र आए क्या करें इन नक़ाबपोशों का जिधर से गुज़रते हैं बेअदब गुज़रते हैं "। 

नैतिकताबद्ध हो 'प्रेम '

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  प्रेम के  बारे में लोगों के अपने अलग-अलग विचार हैं । कुछ लोगों का ये मानना है कि प्यार में नैतिक -अनैतिक कुछ नहीं होता । प्यार में ऐसी कोई चीज़ मायने नहीं रखती,तो जो भी व्यक्ति ऐसा सोचते हैं ये बिल्कुल ग़लत सोच है। दरअसल नैतिकता ही प्यार का स्वरूप निर्धारित करती है । रिश्तों के अनुरूप व्यवहार करना भी हमें नैतिकता ही सिखाती है । प्यार तो हम सभी से करते हैं ,चाहे वो माँ -बाप ,भाई ,बहन ,पति ,बेटा , दोस्त या  कोई भी हो लेकिन इनके प्रति हमारे प्रेम का स्वरूप अलग -अलग होता है जो हमारे अंदर की नैतिकता से संचालित होता  हैं ।  नैतिकता ही हमें ये समझाती है कि प्रेम वास्तव में किसी को ख़ुशी देना है । उसे खुश या उन्नति करते हुए देखना है । किसी को दुःख पहुँचाने की इच्छा रखना ,बदला लेने की मंशा रखना प्यार नहीं है। नैतिक मर्यादाओं  का अहसास यदि व्यक्ति को नहीं होगा तो वो अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति को अनैतिक तरीके से या बलात हासिल करने से परहेज़ नहीं करेगा । अपनी ख़ुशी,हठ या अहम् के लिए किसी को उसकी इच्छा के विरूद्ध अपनाना प्यार नहीं' विकृत भावना है...
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मत रोको ए हवाओं इस' दिए'को जलने दो ये आख़िरी तीली है इससे तो लौ निकलने दो । (खुले स्थान में पूजा करते हुए जब तेज़ हवा चली  और मैच - बॉक्स में अंतिम तीली बची  तब ये ख़याल आया )

मेरा विचार

एक लड़की का स्वं के लिए खाऊँगा ,पिऊँगा संबोधित करना ये दर्शाता है कि कहीं न कहीं लड़कियाँ ख़ुद भी लड़कों को ख़ुद से मै बताऊ  श्रेष्ठ एकलड़की मानती हैं अन्यथा कोई लड़का कभी ख़ुद को मैं खाऊँगी 'पिऊँगी करके क्यों संबोधित नहीं करता ।श्रेष्ठ एकलड़की मानती हैं अन्यथा कोई लड़का कभी ख़ुद को मैं खाऊँगी 'पिऊँगी करके क्यों संबोधित नहीं करता ।

मिज़ाज अपने -अपने

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   आपने अपने आस-पास या कही बाहर भी ये महसूस किया होगा कि कुछ लोग बोलने के बहुत ज़्यादा आदी होते  हैं तो कुछ लोग बिल्कुल कम बोलना पसंद करते हैं । जो ज़्यादा  बोलने के आदी होते हैं उनका ऐसा  हाल रहता  है कि रास्ते से अच्छा -खासा  गुजर रहा  बंदा कब उनकी चपेट में आ जाए भगवान ही जाने । कभी -कभी तो  ये लोग दरवाज़े के बाहर ऐसे घात लगाए बैठे रहते हैं जैसे कोई शिकारी  अपने शिकार पर लगाता है । बस आपके बाहर निकलने की देरी है बस आपको  दबोच  लिया जायेगा।  फिर तो आधा -एक घंटे से पहले आपको  टस से मस नहीं होने  दिया जायेगा । आप मज़बूर से खड़े हुए बस  हाँ ,हूँ ही कर पायेँगे । अपने आस-पास के लोगों की पूरी  ताज़ा -खबरें  आपको ये' चिपकू लाइव 'चैनल स्वत: ही दे देगा । सारी रेसीपीज ,सारे खानदान  का ब्यौरा आपको ये चैनल 1 घण्टे में उपलब्ध करा देगा ।  ये बात अलग है कि  इस ऑटो स्टार्ट चैनल को बंद करने का रिमोट आपके पास नहीं होगा ।  ये अपनी ही मर्ज़ी से शुरू होगा और बंद भी । अब आप जितनी देर यह...

ग़र तेरी रहमत होती

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मुक़द्दर  की बेबसी पर हँसता है ज़माना काश के हाथ में तकदीर होती खजां  को भी वसंत बना देती ग़र ख़ुदा तेरी थोड़ी सी इनायत होती आसताँ पे तेरी जो झुकाती थी सर इस तरहा काफ़िर न होती तुझको जो क़ुबूल उसकी इवादत होती आशियां उसका इस तरहा ना उजड़ता कभी मिली उसको जो तेरी रहमत होती ।      -तस्वीर साभार गूगल 

शेर (swarachit)

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महफूज़  हूँ  जब तक ख़ामोश मै हूँ कब शोर मेरे शब्दों का जाने मुझको फ़ना  कर दे  

'वो नेक दिल इंसान '

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अपनी अम्मा के पीछे -पीछे भागते हुए वो बहुत दूर निकल गई थी । दूर तक उसे अपनी अम्मा नज़र नहीं आ रही थी। 9 साल की यह नन्ही बालिका गाँव से बाहर दूर किसी जंगल में पहुँच गई थी। उसने देखा चारों तरफ घने-घने पेड़ थे । उसे उस जंगल से बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल पा रहा था और तभी अचानक जोरों की बारिश और शुरू हो गई । बारिश के साथ मोटे -मोटे ओले और गिरने लगे थे । ये एक तेज तूफ़ान था और वो नन्ही सी बालिका इस तूफ़ान में अकेली ,डरी, सहमी सी थी । ओलो की मार खाते खाते और निकलने का कोई रास्ता न मिल पाने के कारण ये बालिका जोर-जोर से रोने लगी ।  कुछ दूरी  पर घने पेड़ों के पीछे शायद कोई एक कच्चा सा घर था जो स्पष्ट दिखाई नहीं दे पा रहा था। उस घर से कोई व्यक्ति उस बालिका की रोने की आवाज़ सुन कर बाहर आया।उसने बालिका से उसके रोने का कारण पूछा और फिर उसके परिजनों की जानकारी ली । सौभाग्य से वह व्यक्ति उस बालिका  के परिजनों का परिचित निकला । उसने बालिका को बड़े ही स्नेह से कुछ-खिलाया-पिलाया और उसे बड़ी ही आत्मीयता से विश्वास भी दिलाया कि वह उसे उसके घर पहुँचा देगा । बालिका को उस व्यक्ति...
 उसमें है इतनी नेकी,इबादत को जी चाहता है    कोई पूछे क्यों ख़ुद को खुदा वो, होने नहीं देता ।                   

'सबका धर्म मानवता '

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  धार्मिक सद्भावना देश की एकता और मानवता को जीवित रखने के लिए बहुत जरूरी है ।  यदि ये बात सभी लोगों की समझ में अच्छे से आ जाए तो  न तो धार्मिक मतभेद ही पैदा होंगे और न  ही इस आधार पर देश का विभाजन होगा । सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता रखना  बहुत ही आवश्यक है । अपने -अपने धर्म की प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता प्रतिपादित करना एक तुच्छ सोच है । हमारी संस्कृति, हम सभी के धर्म -ग्रन्थ, हमे एक ही शिक्षा देते है और वो है -भाईचारा ,एकता ,सहिष्णुता और सद्भाव । अत: अपने -अपने धर्म की उच्चता को सिद्ध करके परस्पर झगड़े करना ग़लत बृत्ति है। प्रभु ने किसी धर्म विशेष की रचना नहीं की । ये सब मनुष्य द्वारा स्थापित किए गए वैचारिक मतभेदों का नतीज़ा है । ईश्वर ने तो सिर्फ़' मानवता ' धर्म की ही रचना की है ।'   यदि ईश्वर ने  धर्म अलग-अलग बनाए होते तो सबकी शारीरिक रचना भी भगवान सब धर्मों के हिसाब से अलग-अलग बनाते । लेकिन प्रभु ने सभी को एक जैसा बनाया है । सभी में एक जैसा रक्त बहता है । सभी की शारीरिक संरचना एक ही तरह से की है । अगर वेश-भूषा  सभी की एक  ही...

'लफ़्ज़ ज़िंदगी के '(kavita)

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ज़िदगी फूल सी भी है ,और  काँटो सी भी कभी दर्द बन के चुभती है तो, सेज़ ख़ुशी की भी है कभी समंदर में लहरें हैं तो ,साहिल भी है कहीं ये मरुस्थल का बंजर नज़ारा है तो, हसीं वादियाँ भी हैं कहीं मत परेशां हो इन आँधियों से अभी ,बारिशों की भीगी शाम भी है कहीं सहमता है क्यों ग़मों के अंधेरों से प्रखर ,सुखों की सहर भी बाक़ी है अभी चल पड़ा है जो अकेला ही विजय -पथ के लिए ,काफ़िला साथ आने को बाक़ी है अभी वो जो चुप सा है तेरे शब्दों में कहीं ,जब भी बोलेगा जम के बोलेगा कभी ॥

त्यौहारों का उद्देश्य

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त्यौहार आते हैं, चले जाते हैं लेकिन इनको मनाने  के पीछे जो उद्देश्य है वो हर बार ही कहीं नज़र नहीं आता ।  दशहरा आता है -सड़कों पर , मैदान में ,हर घर के बाहर तमाम रावणों के पुतले बना कर रख  दिए जाते हैं ।पठाखे -बारूद भर कर इन्हें जला दिया जाता है लेकिन वास्तविकता में कोई रावण नहीं मरता । बुराईयां ख़त्म नहीं होती । हज़ारों रावण बेख़ौफ़ समाज में घूमते हैं क्योंकि वास्तविकता में राम जैसे गुण ही किसी व्यक्ति में नही मिलते जो इन रावणों  का वध कर सके .इसलिए इस त्यौहार का जो असली उद्देश्य रावण रुपी बुराईयों को ख़त्म करना, कहीं खो जाता है ।  दीपावली आती है ,लोग पटाखों पर अनावश्यक रूपये बर्बाद करते हैं । पटाखों के रूप में तमाम रुपए जला दिए जाते हैं । भरपूर  ध्वनि-प्रदूषण और वायु -प्रदूषण किया जाता है । लोगों के स्वास्थ्य के साथ जम कर खिलवाड़ किया जाता है ।  पटाख़ों पर जितने रूपए बर्बाद किए जाते हैं उनमें कितने ही ग़रीबों के घरों में रौशनी और खाने की व्यवस्था की जा सकती है ,उनके चेहरों पर खुशियां लाई जा सकती हैं लेकिन नहीं तेज़ आवाज़ वाले ...

अपेक्षा करना छोड़ दो

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जिंदगी में खुश रहना है तो अपेक्षा करना छोड़ दीजिए  । किसी से भी अपने लिए अपेक्षा रखना दुःख का मूल कारण है । मानव का स्वभाव होता है कि वो अगर किसी के लिए कुछ करता है तो बदले में अपने लिए भी फिर उससे तमाम अपेक्षाएं पाल लेता है । अगर  वह व्यक्ति उसकी अपेक्षाओं पर खरा उतर जाता है तो संतुष्ट वरना मानसिक अवसाद ,या  गिले -शिक़वे शुरू हो जाते हैं ।  अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि  शेक्सपियर  ने कहा था ''अधिकतर लोगों के दिलों में दर्द व रिश्ते ख़राब होने का कारण दूसरों से अपेक्षा ही है । परिवर्तन संसार का नियम है इसलिए हमें किसी से अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिये ''। दार्शनिक आचार्य ओशो ने भी कहा है कि'' दुःख अपेक्षाओं के द्वारा ही आते हैं क्योंकि जो घटित होता है वह आशीष होता है ''।  इसलिए किसी से भी उम्मीद रखना छोड़ दीजिए । कर्म और दायित्व निभाते जाइए । आप अपने कर्म निष्काम और स्वार्थ रहित भावना से करेंगे तो उनका सकारात्मक परिणाम आपको मिलेगा ही  । ऐसा नहीं भी होता है तो अपेक्षा और फल की कामना न रखने की वजह से आपको उसके लिए दुःख तो  कम से कम महसूस नही...

''होली की शरारत"(kavita)

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रंग -बिरंगे त्यौहारों की एक शऱारत होली थी । पुत गई अच्छे से वो सूरत जो भी जितनी भोली थी । भीगी-भीगी राहें सारी ,शर्मायी सी गौरी थी प्रियतम संग चुपके-चुपके से, उसने खेली होरी थी । गली-मौहल्ले धूम-धड़ाका ,निकली पूरी टोली थी पिचकारी रंगों की भाषा, खुल कर पूरी बोली थी । डरे ,सहमे,दुबके लोगों की ,हिम्मत इसने खोली थी   लिपे -पुते थे  रंग में सारे, सब ने की हंसी -ठिठौली थी। कुछ पक्के रंग थे प्रेम-भाव के ,नफ़रत दिल की मिटा गए सच कहें तो मतभेदों में समझ बनी बिचौली थी ।। -

वास्‍तविक बलिष्ठ

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शरीर से बलिष्ठ किन्तु डरपोक और कमज़ोर मनोबल वाले व्यक्ति से कहीं आकर्षक वो व्यक्ति है जो शरीर से कम बलिष्ठ होकर भी दृढ़  मनोबल से पूर्ण और निर्भीक होता है.यदि एक पुरुष हट्टा -कट्टा शरीर होते हुए भी मुसीबत में फँसे किसी व्यक्ति की मदद न करके उसे अनदेखा कर दे ,किसी स्त्री के सम्मान की रक्षा न कर सके तो वह वास्तविक अर्थों में पुरुष कहलाने योग्य नहीं है । उसकी शारीरिक शक्ति महत्वहीन है, व्यर्थ है । सच्चा पुरुष मन से सशक्त और धर्मनिष्ठ होता है । वो किसी भी निर्बल की रक्षा करने का उच्च मनोबल और मजबूत हौसला रखता है ।मुसीबत में फसे किसी भी असमर्थ प्राणी की रक्षार्थ अपने सारे प्रयास करने को तत्पर रहता है। मुझे गर्व है कि मैं  ऐसे ही उच्च मनोबल वाले इंसान की पत्नी हूँ ।  2013 की बात है हम वैष्णो माँ के दर्शन को जम्मू के लिए निकले थे । जम्मू के लिए हम एक ग्रुप में और अपनी एक पर्सनल बस करके गए थे । इधर से हम सब मस्ती करते हुए माता के मंदिर पहुँचे. सभी ने माँ के दर्शन किए।5-6 दिन के बाद जब हम माँ के दर्शन करके घर के लिए लौट रहे थे तो रास्ते में ही,सामने से आ रही एक कार...
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कैप्टन लक्ष्मी सहगल  आज महिला दिवस के अवसर पर मैं एक ऐसी सशक्त महिला को याद करना चाहूँगी जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योग दान दिया था । लेकिन शायद कम लोग ही उनसे परिचित हैं ।  उनका व्यक्तित्व मुझे बहुत प्रभावित करता है । जिनकी तस्वीर में ही इतना आकर्षण हो ,जो मन को एक साहस और प्रेरणा प्रदान करती हो, वो वास्तविकता में कितनी प्रभावशील रही होंगी । मैं बात कर रही हूँ कैप्टन लक्ष्मी सहगल जी की । कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने न केवल भारत की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी बल्कि स्वतंत्र भारत में भी समाज सेवा में ६५ साल सक्रियता दिखाई । २४ अक्टूबर १९१४ में इस वीरांगना का जन्म एक कुलीन ब्राम्हण परिवार में हुआ था । इनके पिता एस० स्वामीनाथन मद्रास हाईकोर्ट में जाने -माने वकील थे । वो एक धार्मिक व्यक्ति थे । इनकी माता अम्मुकुट्टी भी एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता थीं ।  इसका प्रभाव लक्ष्मी जी पर भी पड़ा । लक्ष्मी जी के माता-पिता इन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे । इसलिए इन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज़ से मेडिकल की डिग्री ली । इन्हों...

'घूँघट'

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  नारी की समाज में स्थिति को लेकर एक  एक विचार नहीं रखा जा सकता ।समाज में उसकी स्थिति में  हर वक़्त परिवर्तन आते रहे हैं ।वैदिक काल और मध्यकाल की स्थिति से लेकर आज आधुनिक युग तक ये परिवर्तन जारी हैं । आज उसकी  समाज में स्थिति पहले की अपेक्षा सुधरी है लेकिन पूरी तरह नहीं ।पर्दा-प्रथा को ही ले लीजिए।मध्यकाल में स्त्री-जाति,पर्दा-प्रथा से सबसे ज़्यादा त्रस्तथी।मुगलों के शासन काल,सामंती व्यवस्था और विदेशी आक्रमण की वज़ह से स्त्रियों को घर में ही रहने की सलाह व चेतावनी दी जाती थी।विलासी-राजाओं की बुरी दृष्टि से बचाने के लिए शायद इस प्रथा की शुरुआत की गई थी लेकिन आज भी ये प्रथा ग्रामीण क्षेत्रों और परंपरावादी परिवारों में अपनी पैठ जमाए हुए है।यहाँ तक कि कहीं-कहीं तो पढ़े-लिखे परिवार भी इस प्रथा को बड़ी ही शिद्दत से निभा रहे हैं । आख़िरकार किसी बुराई को समाज से निकाल कर बाहर करना इतना आसान काम भी तो नहीं है ।  पर्दा-प्रथा या दूसरे शब्दों में'घूँघट'की प्रथा मुझे कभी तार्किक नहीं लगी।औचित्य-हीन ये परम्परा पता नहीं कैसे अपना अस्तित्व बनाए हुए है. आ...

आप मुझे निर्दिष्ट करो

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ये मेरे सपनों की उड़ान और गर्द -गुबार  वाले इस मौसम की गुस्ताखी ,अब हौसलों का सहारा लेकर पहुचूंगी उस  दुनिया में ।तब  जाकर कहूँगी  उस सृजक से कि मै अपना लक्ष्य भूल आई हूँ,तो अब आप मुझे निर्दिष्ट करो कि अब  मै किस दिशा को जाऊं। किस मार्ग को चुनूँ कि मेरा हर भटकाव (सांसारिकता का) ख़त्म हो जाये और मै उस जीत को अर्जित कर  लूं जिसके ख्वाब मुझे रातों को सोने नहीं देते । मै एक विश्वास  उससे पाना चाहती हूँ कि वो कह दे अब तुम्हारी  मंजिल दूर नहीं ।  अब तुम्हारी हर उड़ान को मै अपने नियंत्रण में रखूंगा और तुम्हारे सपनों को दिशा विहीन नहीं होने दूंगा। बस फिर मैं अपनी मंज़िल पा लूँगी और उसे अपना  पथप्रदर्शक बनाकर अपना जीवन आलोकित कर लूँगी।      

आधुनिक नारी

नारी तेरी दीन दशा पर ,प्रकृति भी रोने लगी है उत्कृष्ट कृति श्रृष्टि की तेरी पहचान खोने लगी है। कभी दोषी रहा पुरुषत्व ,कहीं तेरी चेष्टाएं हो रही हैं जन्म दात्री '.आज विलुप्त तेरी ,निष्ठाएं हो रही हैं . प्रणय का निवेदन है पर ,विवाह की अस्वीकृति है उत्सर्ग भी बना अब तो ,विवशता की अनुकृति है फूल सी कोमल '. क्रूर क्यों होने लगी है , पावन छवि अपनी खुद ही धोने लगी है। दुग्ध -पान अंक में करा ,सर्प-दंश पालती है संस्कार हीन बना पुत्र को ,अंध -गर्त में डालती है लक्ष्य हीन तेरे पथ की ,दिशाएं होने लगीं हैं उच्छ्रिङ्खल्ता की तुझ में निशाएँ सोने लगीं हैं ।