प्रेम के बारे में लोगों के अपने अलग-अलग विचार हैं । कुछ लोगों का ये मानना है कि प्यार में नैतिक -अनैतिक कुछ नहीं होता । प्यार में ऐसी कोई चीज़ मायने नहीं रखती,तो जो भी व्यक्ति ऐसा सोचते हैं ये बिल्कुल ग़लत सोच है। दरअसल नैतिकता ही प्यार का स्वरूप निर्धारित करती है । रिश्तों के अनुरूप व्यवहार करना भी हमें नैतिकता ही सिखाती है । प्यार तो हम सभी से करते हैं ,चाहे वो माँ -बाप ,भाई ,बहन ,पति ,बेटा , दोस्त या कोई भी हो लेकिन इनके प्रति हमारे प्रेम का स्वरूप अलग -अलग होता है जो हमारे अंदर की नैतिकता से संचालित होता हैं । नैतिकता ही हमें ये समझाती है कि प्रेम वास्तव में किसी को ख़ुशी देना है । उसे खुश या उन्नति करते हुए देखना है । किसी को दुःख पहुँचाने की इच्छा रखना ,बदला लेने की मंशा रखना प्यार नहीं है। नैतिक मर्यादाओं का अहसास यदि व्यक्ति को नहीं होगा तो वो अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति को अनैतिक तरीके से या बलात हासिल करने से परहेज़ नहीं करेगा । अपनी ख़ुशी,हठ या अहम् के लिए किसी को उसकी इच्छा के विरूद्ध अपनाना प्यार नहीं' विकृत भावना है...