संदेश

2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
चित्र
दुनिया में हर व्यक्ति की अपनी अलग मनोवृत्ति है, अपना व्यवहार होता है और दूसरे हमें सिर्फ अनुमान के आधार पर ही जानते हैं.हम जैसे हैं वैसे रूप में हमें कोई -कोई ही समझता है।अगर कोई सही से समझ पाता है तो उससे संबंध अच्छे हो जाते हैं जो सही से नहीं समझ पाते उससे संबंध ख़राब हो जाते हैं। यहाँ पूरी दुनिया एक दूसरे के व्यवहार को अनुमान और अपनी कल्पनाओं के आधार पर ही ग्रहण करती है इसलिए ये सोच कर दुखी नहीं होना चाहिए की अमुक व्यक्ति हमें सही से नहीं समझता.हमें हमारे प्रभु सही से समझे बस। बाकी किसी को समझाने की ज़रूरत नहीं। किसी सामान्य व्यक्तित्व में इतनी क्षमता नहीं कि किसी अन्य व्यक्ति को सही से समझ सके। ये कार्य सिर्फ ईश्वर से जुड़ा, पवित्र हृदय का व्यक्ति ही कर सकता है .इसलिये प्रभु की नजर में सही बने रहकर निश्चिंत हो कर, हर काम कीजिए और मस्त रहिए।आपको सिर्फ प्रभु को प्रसन्न करना है सांसारिक लोगो को तो कोई कभी खुश कर ही नहीं पाया।उनके पास तो सिर्फ शिकायतों की लंबी सूची और उलाहने ही होते हैं। प्रभु के बनकर रहिए और सब प्रभु पर छोड़ दीजिए.कोई आपकी चिंता करे, आपको सही से समझ पाए तो ठीक अन्यथा ...

'समझ'

चित्र
दुनिया बड़ी विचित्र है यहां सब अपने को दूसरे से श्रेष्ठ मानते हैं और सबको ही एक दूसरे से शिकायत है।यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके सबके साथ संबंध अच्छे हों फिर भी दूसरे को खुद से निम्न और खुद को दूसरे से श्रेष्ठ मान कर चलते हैं. जरा विचार कीजिए अगर दोनों अच्छे होते तो ना एक दूसरे से दोनों को शिकायत होती न झगड़े.सारी समस्या का कारण है अपेक्षा, उम्मीद।अगर आप किसी से उम्मीद रखते हैं कि वो आपके अनुसार बने तो आपको भी उसके अनुसार बनना होगा।अन्यथा शिकायत करना बंद करे।जब आप खुद को बदलना नहीं चाहेंगे तो दूसरे से उम्मीद क्यों? इसलिए सुखी रहना है तो इच्छाओ पर नियन्त्रण रखें।दूसरो से सुख पाने की नहीं, सबको सुख देने की इच्छा रखें.जब तक स्वार्थी बने रहेंगे, सुख भोगने की इच्छा रखेंगे और दूसरे को अपने अनुकूल बनने की कोशिश करते रहेंगे तब तक दुख से नहीं बच पाओगे.और यहीं सारी उम्मीद क्लेश, द्वेष और विवाद उत्पन्न करती रहेंगी।जब तक मेरा - मेरा का भाव ख़तम नहीं होगा तब तक दूसरे के प्रति सहनुभूति और प्रेम का भाव नहीं होगा।और स्वार्थ और अपेक्षा ही दुख का मूल कारण है।उमर के अनुसार इच्छाएं और व्यवहार  पर...

कर्मा

चित्र
सृष्टि में जितने भी इंसान हैं सब प्रभु की मर्जी से प्रकट हुए हैं .लेकिन साथ ही सब अपना अपना प्रारब्ध, संचित कर्म लेकर चल रहे हैं।मनुष्य योनि सबसे श्रेष्ठ योनि मानी जाती है।अन्य सारी योनि तो भोग योनि है लेकिन मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है जो अपने वर्तमान कर्मों के हिसाब से अच्छा या बुरा फल भोगती है और अच्छे कर्म करके ईश्वर की प्राप्ति भी कर सकती है इस योनि में जो भी कर्म करे बहुत सोच समझ कर करे। क्योंकि इस योनि में अगर आपने ईश्वर प्राप्ति नहीं की तो आपको अनेक योनियों में भटकना बढ़ेगा।मनुष्य शरीर पाकर इसलिए कोई भी गलत कर्म न करें.आप जिसके प्रति भी गलत कर्म करेंगे वो किसी ना किसी रूप में आपके सामने अगले जन्म में प्रकट होता रहेगा।इसलिए मोह का नाश करते हुए, विवेकशील बनते हुए हमें अध्यात्म और ईश्वर से जुड़कर अपनी जिंदगी सिर्फ कर्तव्य निर्वाह के लिए जीनी है.किसी की भी आत्मा को दुखाना या ईश्वर द्वार निर्मित इस दुनिया में किसी भी व्यक्ति की शारीरिक कमज़ोरी या मानसिक कमज़ोरी का उपहास करना, मज़ाक उड़ाना बहुत घातक हो सकता है  .यहां जिसको जो स्थिति मिली है सब अपने कर्मनुसर मिली है।इसलिए आप जिसका भ...

'तुम्हे मुबारक'(Hindi poem)

चित्र
मै  शांत हूँ,उद्विग्नता तुम्हें मुबारक़ मै पवित्र हूँ,अशुद्धता तुम्हें मुबारक़  मैं उन्मुक्त हूँ,बंधन तुम्हें  मुबारक़  मैं मौन हूँ,शोर तुम्हें मुबारक़  मै प्रीत हूँ,बैर तुम्हें मुबारक़  मै मृदु हूँ,कटुता तुम्हें मुबारक़  मैं क्षमा हूँ प्रतिशोध तुम्हें मुबारक़ || 

''मत भूलो ये भारत है''

चित्र
शादी की उम्र बढ़ाना और लिवइनरेलशनशिप को छोटी उम्र में ही परमिशन देना,समलैंगकिक विवाह की अनुमति  के समर्थन की बात करना। ये सब क्या मज़ाक है?कैसा  खिलवाड़ है संस्कृति के साथ। आखिर हम देश की संस्कृति का कचरा करने पर क्यों लगे हुए हैं। करना क्या चाह  रहे हैं ?क्या हम सभी को व्यभिचारी बनाना चाहते हैं? जो संस्कृति अपनी विशिष्टता के लिए विश्व भर में प्रसिद्द है उसे क्यों नष्ट करना चाह रहे हैं। जिस देश की शिक्षा में  संस्कार और मर्यादा की बात प्रमुख रूप से होती है और बाकी सब ज्ञान बाद में उस देश की पहचान हम क्यों  मिटाना चाहते हैं।मानती हूँ  की महिलाओं के विकास और शिक्षा व्यवस्था पर भी  उतना ही ज़ोर देने की ज़रूरत है   जितनी की पुरुषों पर। दोनों को समान उन्नति के अधिकार मिलने ज़रूरी हैं।परन्तु वर्तमान में दोनों को ही उन्नति के  नाम पर जो स्वतंत्रता दी जा रही है वो उचित नहीं है।महिलाओं ने तो स्वतंत्रता के नाम पर हद  ही कर दी है न तो  पहनावे में शालीनता बची है और न ही आचरण में. जिस देश में आत्म सम्मान की और चरित्र की रक्षा हेतु तमाम नारियाँ जौ...

"फौजी भाई"

चित्र
अपने लिये तो सभी जीते हैं जो दूसरों  के  लिए ज़िये वही मनुष्य है.हमारे देश के सुरक्षा प्रहरी,हमारे शेर दिल फौजी भाई इस कसौटी पर खरे उतरते हैं. प्रणाम हैं इनके ज़ज्बे को,इनकी श्रेष्ठता को,इनके साहस और शौर्य को. सामान्य उद्देश्य से जीने  के अवसर तो सभी को मिलते हैं मगर किसी विशिष्ट उद्देश्य (परमार्थ हेतु) हेतु मरने का अवसर यूँही नहीं मिलता.हमारे फौजी भाई चुनते हैं इस अवसर को और अजर-अमर हो जाते  हैं .तभी तो  इनकी  तुलना  संतों  से की  जाती  है.इन्हे  त्यागना  पड़ता  है हर चीज का मोह,जीना  होता है सिर्फ देश के लिये .देश ही इनके लिये भगवान  होता है और सारे कर्तव्य और कर्म  भी इसके लिये.इसलिए ये ही सच्चे हीरो हैं।ये ही विशिष्ट सम्मान के अधिकारी हैं।ये ही प्रशंसा के पात्र हैं।ये ही देश के अमूल्य रत्न हैं।अपनी जान बचाकर जीना तो कायरो का काम है.दूसरों  की जान  बचाकर जो शहीद हो जाये वही सच्चा इंसान है, सेना का जवान है .हम अपने घर मे आराम से  जो खा पी रहे हैं उसके पीछे इनके कितने ही भूखे पेट बीते दिन हैं.हम...

'शुद्ध भक्ति'

चित्र
'शुद्ध भक्ति ' शब्द को सुनकर मन में सभी के दिल में ये ख्याल तो ज़रूर आया होगा की भक्ति में शुद्ध और अशुद्ध  का क्या मतलब हुआ। दरअसल भक्ति में शुद्ध और अशुद्ध का सम्बन्ध भक्त की भावना से होता है। भक्त भी दो तरह के होते हैं- एक वो जो अपनी तमाम इच्छाओं की पूर्ती हेतु भक्ति करते हैं,जगह जगह के मंदिरों में  जाकर पूजा अर्चना करते हैं,धोक लगाते हैं कि अमुक समस्या या दुःख खत्म हो जाएगा तो इतने का प्रसाद चढ़ाएंगे  या कोई भी कार्य।कुछ मामलो में तो दूसरों के अहित की कामना से भी कुछ लोग पूजा करते हैं. सही इच्छाओं की पूर्ती के लिए की गई पूजा में  कोई बुराई नहीं है लेकिन ग़लत इच्छाओं के लिए की गई पूजा भी  पाप कर्म में ही आती है।सबसे निकृष्ट लोग वही होते हैं जो भक्ति की आड़ में अपनी ग़लत इच्छाओं की पूर्ती की  कामना रखते हैं।इनकी कोई कामना तंत्र -मंत्र से पूरी हो भी जाये तो ऐसे लोगो का अंत बड़ा भयावह होता है। ये ज़िंदगी मौत के बीच में झूलते रहते हैं और बड़ी ही दर्दनाक मौत होती है इनकी,और प्रेत योनि में जाते हैं। दूसरी भक्ति होती है-निःस्वार्थ भक्ति जिसमें कोई इच्छा नहीं होती।बस प्...

'असमानता क्यों '

चित्र
    समाज में कुछ चीज़े बड़ी अव्यवस्थित और अतार्किक हैं। पहले लड़की-लड़के में भेद की मानसिकता थी तो लड़किया दुखी और त्रस्त थीं। अब लड़कियों को इतना प्रोटेक्ट किया जा रहा है की लड़के असुरक्षित हो गए हैं। ऐसे ही कहीं बुजुर्गों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा की बात की जा रही है तो उन बहुओं  के साथ अन्याय हो रहा है  जो अपने ऊपर उन अत्याचारों को झेल चुकी हैं जो सास ने अपनी बुढ़ापे से पहले की उम्र में किये हुए थे। अब सास के पास तो बुढ़ापे की उम्र की सहानुभूति है स्वं के लिए लोगों से,परन्तु बहु को जो मानसिक बीमारियां  और शारीरिक बीमारियां उसकी वजह से मिली उनको समझने और सुनने वाला कोई नहीं। अब ऐसी स्थिति में विवाह से पहले बालक-बालिका असमानता को झेलने वाली उन बालिकाओं की स्थिति पर ज़रा  विचार कीजिये जो विवाह से पहले भी असमानता की वजह से पारिवारिक सुख से वंचित रही और विवाह के बाद  ससुराल में बहु से की जाने वाली सारी अपेक्षाओं की वजह से बाद में भी दुखी हो रही हैं। क्या हर परिवार की स्थिति और परस्थिति समान होती हैं ? नहीं !  सबको अलग-अलग माहौल और सुविधा-असुविधा मिलती हैं।...

'मै 'से परे ही ईश्वर हैं

चित्र
'मैं' अपने आप में एक बहुत ही छली  शब्द है.इसका कोई अर्थ है ही नहीं  क्योंकि शरीर तो आत्मा से चल रहा है  और आत्मा के शरीर से बाहर आते ही  सम्पूर्ण शरीर  का अस्तित्व ही समाप्त  हो जाता है.तो आत्मा ही मूल हुई. आत्मा ही ईश्वर है. ईश्वर ही प्रमुख हुए। फिर व्यर्थ का अहम्, व्यर्थ का भ्रम नहीं  पालना चाहिए की आप सब कर रहे हैं  क्योंकि आप कुछ भी करने लायक रहेंगे  या नहीं ये भी ईश्वर ही निश्चित करेंगे। आपकी हर सांस उसके हाथ में है। आपका प्रारब्ध व आपके आज के कर्म  ही आपका वर्तमान और भविष्य निर्धारित करते हैं. कर्म अच्छे हैं तो आपकी बुद्धि पवित्र  योजनाएं बनायेगी.अच्छे निर्णय  करवाएगी वरना गलत कर्म,गलत योजना  और निर्णय के लिए आपकी बुद्धि प्रेरणा  देगी जो आपके भविष्य के लिए घातक  होगी.धन, संपदा का आना या भौतिक  इच्छा पूरी होना सुख नहीं है।पवित्र बुद्धि  होना और हर कर्म पवित्र भाव लेकर  करना भविष्य के लिए सुख की गारंटी हो  सकती है।इसलिए 'मै' को नही भीतर  बैठे  प्रभु को ध्यान रख कर कर्म करें....