बेवज़ह




कभी -कभी कुछ नहीं होता लिखने को जबकि मन भरा होता है

न जाने कितने ही ख़यालों से

कोई शब्द नहीं मिलता जबकि हज़ार शब्द होते हैं 

शब्द -खाने में 

बेकार की कोशिश में गुज़र जाता है दिन कोई नज़्म बनाने में 

जबकि कोई लय ,कोई ताल नहीं मिलता 

सुर सजाने  में। 

गुज़रता जाता है वक़्त यूँही बेवजह ,बेलगाम, 

रात भर जगती हूँ मै

नींद को मनाने में। 

ख़ाली पन्नों पर कुछ बिख़रे हुए अक्षर ,वक़्त  बड़ा लगता है 

सबको ठिकाने लगाने में।

बड़ी मुश्किल से कोई रचना गढ़ी जाती है

और होश उड़ जाते हैं सब के ज़हन तक पहुँचाने में।

-अंशु चौहान








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