'मोह के वशीभूत न हों '
भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि मोह सब दुखों कारण है .मोह के वशीभूत होकर ही इंसान कई तरह के अपराध कर बैठता है .मोह ही इंसान को स्वार्थी और विवेक शून्य बना देता है .इसलिए तुम्हे कोई कितना भी प्रिय क्यों न हो उसके प्रति मोह ग्रसित नहीं होना है .प्रेम हो पर मोह न हो .अब प्रेम और मोह में अंतर समझिये.जब आप किसी का ख़याल रखते हैं तो इसे प्रेम कहते है लेकिन जब आप उस व्यक्ति विशेष का ही खयाल रखते हुए उसके लिए किसी दूसरे को हानि पहुंचाने से भी नहीं चूकते तो इसको मोहान्ध होना कहते हैं .
मोह जितना उसके लिए हानिकारक है जिसके प्रति कि आप ये रखते हैं उतना ही स्वं आप के लिए भी है क्योंकि ये सही और गलत की समझ खो देता है .मोह से ग्रसित व्यक्ति की सोच विवेक रहित होती है इसलिए ये कई बार तुम्हारे अज़ीज़ का भविष्य ही ख़राब कर डालती है. इसलिए किसी के प्रति प्रेम भाव तो रखिए लेकिन मोह मत रखिए .मोह से ग्रसित मन न तो दूरदर्शी होता है न हितकारी .ये प्रत्यक्ष रूप से दूसरों का व अप्रत्यक्ष रूप से अपनों का भी दुश्मन होता है .सच तो ये है कि आप जिससे अधिक मोह रखते हैं वो भी आपके इस अति मोह से परेशान हो जाता है क्योंकि आपके इस अति मोह के कारण उसकी स्वतंत्रता ,उसका व्यक्तिगत जीवन प्रभावित होता है .जिसे भी आप प्यार करते हैं वो भी उन्मुक्त रहना चाहता है,उसे भी आपके प्रतिबन्ध अच्छे नहीं लगते .इसलिए आप जिसे प्यार करते हैं उसे स्वतंत्र छोड़िये ,उसे खुद के निर्णय खुद लेने दीजिए .उसकी हर चीज़ में अपना दख़ल मत दीजिए ,नहीं तो आपका प्यार उसके लिए बंधन और घुटन हो जाएगा . अति हर चीज़ की बुरी होती है.अति प्रेम ही मोह बन जाता है जो सब दुखों का कारण है.
तुलसीदास का मोह अगर उनकी पत्नी भंग ना करती तो तुलसी दास कभी इतने बड़े कवि ना बन पाते और ना इतने बड़े काव्य की रचना कर पाते .मोह तमाम अपेक्षाओं को जन्म देता है और अपेक्षायें पूरी न होने पर दुखों को जन्म देती हैं.
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