'चलती रहो ,निरंतर,अनवरत '


रोज देखती हूँ नए सपने,रोज उठती हूँ मन में उत्साह लिए

रखती हूँ हर कदम संभल के मंजिल के लिए,मगर मंजिल नहीं मिलती.

खाली पन्नों पर बढ़ता जाता है भारी शब्दों का बोझ,

उदास सी चलती है रफ्तार से दौड़ने वाली कलम.

निचुड़ा हुआ दिल कोसता है ज़ज्बातों को,

सयाना दिमाग संभाल लेता है सारी बिगड़ी बातों को .

धैर्य,विवेक की बातें कर फिर खड़ा कर देता है मंजिल को दर्शाते पत्थर के पास, 

यूँ कह कर कि अब शुरू करो विश्वास के, हौसले के साथ,

हारोगी नहीं,पा लोगी उस मंजिल को,

बस चलती रहो ,बिना रुके,निरंतर,अनवरत .

-अंशु चौहान                                                                              

         

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