बुराई और कलियुग
कलियुग और बुराई का घनिष्ठ संबंध है .ये एक दूसरे के पूरक हैं.अगर बुराइयों का अस्तित्व न हो तो कलियुग का अस्तित्व भी संभव नहीं है और कलयुग है तो बुराइयां होना भी स्वभाविक है। मोह और लोभ जैसी भावनाएं ही कलयुग में प्रबल होती हैं। 'मोह' सही और ग़लत का फ़र्क करने से रोक देता है और विवेक हर लेता है। मोह ही लोभ पैदा करता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कोई भी अपराध करने पर मज़बूर हो जाता है। लोभ इंसान में तृष्णा पैदा करता है ,असंतोष पैदा करता है।लोभ के वशीभूत इंसान इन्द्रिय तृप्ति हेतु कुछ भी व कैसे भी पाने को उत्सुक रहता है। यही दोष कलयुग का अस्तित्व बनाये रखने में ज़िम्मेदार होते हैं। अगर हर व्यक्ति के मन से से ये दोष निकल जाएँ तो कोई बुराई ही नहीं रहेगी,अपराध नहीं होंगे और अपराध नहीं होंगे तो हर व्यक्ति हर वक़्त सुरक्षित रहेगा। व्यवस्था सुधारने हेतु किसी तंत्र की आवश्यकता नहीं होगी।
वास्तव में बुराइयाँ ही कलयुग में सारी परस्थिति ऐसी विपरीत बना देती हैं कि इंसान इनमें उलझता जाता है। इन बुराइयों की वजह से ज़रूरत पड़ती है व्यवस्थापिका,कार्यपालिका व् न्यायपालिका आदि की। और एक तरह से देखा जाये तो कलयुग में सभी अधिकतर पदों का सृजन भी इन्ही वृत्तियों ,इन्ही दोषों की उपस्थिति की वजह से ही हुआ है। तो ये कह सकते हैं कि कलयुग में सभी को रोजगार भी इन्ही दुर्वृत्तियों की वजह से ही मिल रहे हैं। इसीलिए शायद पुरातन सभ्य युग में इतने पद नहीं थे जितनी और जिस तरह की जॉब और पद आज हैं।
उदहारण के लिए अस्पताल का अस्तित्व है क्योंकि अधिकतर लोग बीमार हैं जिनका कारण है -मानसिक विकृतियां। मन के इन प्रमुख दोषों में शामिल हैं काम, क्रोध ,मद ,लोभ.ये दोष ही सभी तरह के अपराधों को जन्म देते हैं.अपराध होते हैं तो ज़रूरत होती है न्यायपालिका,कार्यपलिका व व्यवस्थापिका की.यहाँ तक की सभी देशों में जल,थल व् वायु सेना की आवश्यकता भी इसीलिए है कि पूरी दुनिया प्रेम पूर्ण व्यव्हार नहीं अपनाती आपस में। विश्व बंधुत्व की भावना होती तो किसी भी फोर्स की ज़रूरत नहीं होती। अन्याय नहीं होता तो न्याय पालिका की ज़रूरत नहीं होती। हर कोई आत्म अनुशासित होता तो व्यवस्थापिका की ज़रूरत नहीं होती। अपराध नहीं होते तो कार्यपालिका की भी ज़रूरत भी नहीं होती।
इसी तरह रेस्टोरेंट ,डांस बार ,हुक्का बार आदि अस्तित्व में हैं क्योंकि जीभा पर नियन्त्रण नहीं है. मन भोग विलास
में उलझा है.विद्यालय होते हुए भी कोचिंग सेंटर की ज़रूरत है क्योंकि विद्यालय बच्चों की शिक्षा को व्यापारिक नज़रिये से देखते हैं दायित्व के नज़रिये से नहीं.जब तक मनुष्य में बुराई हैं तब तक अपराध हैँ और जब तक अपराध हैँ तब तक कलियुग बना रहेगा.
यहाँ मै बुराइयों का महिमामंडन नहीं कर रही हूं वरन ये कहना चाह रही हूं कि प्रभु का हर कर्म ,उसकी हर रचना, उसका उद्देश्य, हम मनुष्य की समझ से बाहर है.सभी युगों का निर्माण व उनके विनाश के पीछे उसका कोई बड़ा अर्थ होता है जिसे हम समझ पाने में असमर्थ हैं.
इंसान के पास जब कुछ नहीं होता तब भी दुखी, कुछ होता है तब भी दुखी और जब बहुत कुछ होता है तब भी दुखी।इंसान वास्तव में सबसे सुखी होना चाहता है और उसकी यही ज़िद उसे कभी सुखी नहीं होने देती क्योंकि इस भौतिक जगत में कोई सुखी हो ही नहीं सकता चाहे वो कितना भी संपन्न क्यों न हो जाये।
सबसे सुखी होना है तो आध्यात्मिक जगत से जुड़ना होगा। भौतिक इच्छाओं को ख़त्म करके ईश्वर से जुड़ने की इच्छा रखनी होगी।
इंसान अपनी ही इच्छाओं,अपनी ही वृत्तियों से दुखी है परन्तु एक दूसरे पर दोषारोपण करने में लगा है।
मोह ग्रसित है इसलिए सांसारिक चीज़ों से विमुख नहीं होता और परिणामस्वरूप अपने सगों से दुःख पाता है क्योंकि ईश्वर को नहीं सांसारिकता और भौतिक सुविधाओं को श्रेष्ठ मानता है।
अगर हर इंसान में संतोष होता तो जीने के लिए सिर्फ़ बेसिक ज़रूरतों को महत्व देता और संतोष और ख़ुशी से रहता ना लोभ होता ,न प्रतिस्पर्धा होती ,बस मनुष्य जन्म का सही लाभ पाने हेतु ईश्वर के प्रति भक्ति में ,हर कर्म करता।
मगर आज स्थिति ये है कि गाड़ी है तो सबसे अच्छी होनी चाहिए ,टॉप कम्पनी की होनी चाहिए। कपडे थोड़े नहीं ज़्यादा होने चाहिए ,ज़्यादा ही नहीं ब्रांडेड भी होने चाहिए। हर चीज़ टॉप क़्वालिटी और सबसे अच्छी होनी चाहिए।
इंसान इस पृथ्वी पर अपने जन्म के उद्देश्य को ही भूल चुका है।
इंसान को ईश्वर ने यहाँ लग्जरी गाड़ी ख़रीद कर चलाने को ,अनावश्यक व्यसन की चीज़ों पर पैसा उड़ाने को नहीं भेजा है।बेचारा मोह व माया में फँसा इंसान सांसारिक दौलत और शोहरत को ही ज़िंदगी का लक्ष्य और सफ़लता मान बैठा। भगवान ने हमें पृथ्वी पर ये कहकर तो नहीं भेजा कि जाओ वत्स !तुमने एक भी ग़लत कर्म नहीं किया तो इसलिए जाओ पृथ्वी लोक पर जाकर महंगी गाड़ियों में घूमो ,पिज़्ज़ा ,बर्गर खाओ ,व्यसन करो। मेरा नाम व भजन सुनने की ज़रूरत नहीं है वहाँ के भद्दे ,ऊटपटाँग गानों पर थिरको ,हाथ -पैर मारो।
फिर क्या सोच कर हम इन चीज़ों में रमे हुए हैं, ज़िंदगी का असली उद्देश्य भूलकर।
84 लाख योनियों की अपनी करतूतों को भुगत कर तो हमने ये मनुष्य जन्म पाया है और इसमें लगे हैं बकरे ,मुर्ग़े की टांग चबाने में,मदिरा पान करने में और फ़िल्मी उलजूलूल गानों पर अपने स्केलेटन को हिलाने में। अरे नशा करना है तो भक्ति का करो ,इस शरीर के ढांचे को हिलाना है तो प्रभु भजनों पर हिलाओ। ईश्वर हेतु जब शरीर का उपयोग होगा तभी मनुष्य जन्म सफल होगा वरना तो ख़ुद के लिए आये और ख़ुद के लिए ही गए। फिर से वही ८४ लाख योनियों का सिलसिला। ..
तो अब बस भी करो ,कुछ तो दिमाग लगा लो भगवान में। उससे सुखद ,प्यारा और सम्पूर्ण कुछ नहीं मिलेगा।

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