भौतिकता के परे सुकून
कितना असंतोष था पहले ज़िंदगी में कि ये अचीव नहीं किया ,वो अचीव नहीं किया ,कुछ करना है ज़िंदगी में. नाम शोहरत ,पैसा और ज़्यादा हो.... कितनी तृष्णा थी मगर न जाने कैसे और कब ईश्वर ने अपनी तरफ़ मुझे खींच लिया। सारी भौतिक इच्छाएँ धीरे -धीरे ख़त्म होती जा रही हैं। जो चीज़ें पहले मुझे आकर्षित करती थीं अब मुझ पर कोई प्रभाव नहीं डालती। किसी भौतिक चीज़ में मेरा आकर्षण नहीं रहा है अब हालाँकि भौतिक चीज़ों में मेरा आकर्षण पहले से ही काफ़ी कम रहा है लेकिन अब तो नीरसता सी ही पैदा हो गई है। बस सांसारिकता को निभाना एक कर्त्तव्य ,प्रभु की आज्ञा पालन और उनकी इच्छा का सम्मान करना मात्र है।
अब आकर्षण है तो प्रभु भक्ति में ,उनकी कथा सुनने में ,उनसे सम्बंधित किसी भी चर्चा में। उनके स्वरुप दर्शन में. अब तो बाक़ी सब चीज़ें पागलपन ,अज्ञानता से उपजी भटकन लगती हैं। सच में ईश्वर से प्रेम ,तुम्हें ये सिखा देता है कि उससे सुखद ,उससे प्यारा ,उससे श्रेष्ठ कोई अहसास इस सृष्टि में नहीं है। सब चीज़ें ,व्यर्थ हैं। सारी उपलब्धियां कोई मायने नहीं रखती। इतने सुखद अहसास ,इतनी प्यारी अनुभूति से इतने समय से वंचित रहकर हमने ज़िंदगी के कितने अमूल्य क्षण फ़ालतू की चीज़ों में बर्बाद कर दिए। ईश्वर से जुड़ाव ,उनके प्रति समर्पण इतना सुकून ,इतनी तृप्ति देता है कि दुनिया चाहे फिर किसी भी चीज़ के पीछे भागती रहे परन्तु एक भक्त के लिए इन चीजों का कोई ख़ास मतलब नहीं है। एक मनुष्य के रूप में जन्म का सही उद्देश्य भी भक्ति ही स्पष्ट करती है।
पहले हर वक़्त एक प्रश्न परेशान करता था किसी भी कर्म को करने के बाद ,कि इससे क्या होगा,ज़िंदगी का असली उद्देश्य क्या है आख़िर। अब ये प्रश्न परेशान नहीं करते। अब एक अज़ीब सी शांति और ख़ुशी रहती है दिल में। भौतिक चीज़ों में सुख पाने की कोई इच्छा नहीं होती अब। सच तो ये है कि मनुष्य के रूप में जन्म लेकर हमारा सबसे बड़ा दायित्व ये है कि हम मानवता के संरक्षक बने। मानवीय मूल्यों से विमुख न हों ,और मानवीय मूल्यों में विश्वास तभी होगा जब ईश्वर के प्रति आस्था और कृतज्ञता होगी। इस कृतज्ञता को व्यक्त करने के लिए ईश्वर की भक्ति ज़रूरी है। ईश्वर की सच्ची भक्ति हमें मानवीयता सिखाती है ,हमारे अंदर दया ,सहिष्णुता ,क्षमा आदि गुण पैदा करती है।
अब ईश्वर भक्ति की उम्र क्या हो इस बात को लेकर हर व्यक्ति भ्रमित है। अधिकतर लोग समझते हैं कि भक्ति बुढ़ापे में अर्थात सारे दायित्व से मुक्ति के बाद करनी चाहिए। यदि इस बात पर अमल किया जाये तो भक्ति करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि बुढ़ापे में शरीर में कई तरह की बीमारियाँ घर कर लेती हैं। व्यक्ति चलने फिरने में भी असमर्थ हो जाता है और साथ ही बिना भक्ति के उसका आधा समय पहले ही बर्बाद हो गया होता है तो उसके पास समय और स्वास्थ्य दोनों ही नहीं होते हैं। वैसे भी जिस तरह भगवान को हम पूजा में ताज़ा ,बिना मुरझाये पुष्प समर्पित करते हैं उसी तरह ईश्वर की पूजा भी हमें कम उम्र से ही ,स्वस्थ व युवा शरीर में ही कर देनी चाहिए। बुढ़ापे के इंतज़ार में बैठे रहे और पहले ही अलविदा कह गए तो फिर कुछ नहीं हो सकता। फिर तो वही ८४ का सिलसिला शुरू हो जाएगा।
लोग अक्सर ये मानकर चलते हैं कि अभी तो बहुत समय है, कर लेंगे बाद में भक्ति भी जब समय मिलेगा।
अरे ज़िंदगी की कोई फिक्स एक्सपायरी डेट नहीं होती भैया! इसलिए समय पर जाग जाओ तो ही बढ़िया।
मनुष्य के द्वारा जिस चीज़ को प्रथम स्थान पर रखा जाना चाहिए था उसे उसने लगभग सोच से बाहर ही कर दिया है।
भोग-विलास माया में इतने पागल हैं कि नाचे जा रहे.ख़ुश हो रहे हैं व्यर्थ की चीज़ों में उलझकर। सफल मान रहे हैं भौतिक उपलब्धियाँ हासिल करके खुदको ,मानो हमेशा यहीं बने रहेंगे इनको भोगने के लिए इस भौतिक जगत में. कितना ही नाम कमा लो ,कितना ही पैसा, कब हाथ से छूट जाए ,कब जाना पड़ जाए ,पता नहीं। मगर जहाँ जाना है वहाँ की कोई तैयारी ही नहीं है । उस लोक में सफलता और उच्च स्थान पाने के लिए आत्मिक उन्नति का कोई प्रयास नहीं ,तो वहाँ क्या करोगे? कहाँ और किस अवस्था में रहोगे?

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