मर्द
'मर्द 'एक ऐसा शब्द जिसको सुनते ही अक्सर लोग दिमाग में एक मुश्टण्डे,बात-बात पर मार काट पे उतारू होने
वाले,गाली गलौच करने वाले ,स्त्रियोँ को कमज़ोर समझ कर उन पर चिल्लाने वाले किसी शख्स का चित्र अपने
दिमाग में ले आते हैं और ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि पुरुष प्रधान समाज में पुरुष को आक्रामक
,मुँहफट,और शक्ति प्रदर्शन करने वाला ही दिखाया गया है।
समाज की इसी सोच का नतीज़ा ये रहा है कि हर पुरुष प्रजाति का प्राणी स्वं को इसी छवि में देखने लगा है और
अपना व्यक्तित्व भी ऐसा ही बनाने का प्रयास करने लगा है लेकिन ऐसा कम बुद्धि वाले,विवेक शून्य लोगों द्वारा ही
किया जाता रहा है।
जो वास्तविक अर्थ में पुरुष होते हैं वो समझते हैं पुरुष होने का मतलब।
अगर हम संस्कृत भाषा की दृष्टि से इसके अर्थ को देंखे तो वेदों और सांख्य शास्त्र में
पुरुष का अर्थ परमात्मा या जीवात्मा से लिया गया है जो इस शब्द की पवित्रता को स्पष्ट करता है।
लेकिन मर्द एक उर्दू शब्द है तो इसका अर्थ भी निश्चित ही अलग भाव लिए तो होगा ही.....|
हर आदमी स्वं के लिए 'मर्द' शब्द का ही अधिक प्रयोग क्यों करता है क्योंकि इसमें उसे अपने दम्भ,अपनी
कुण्ठा,अपनी खोखली ताकत का दिखावा करने का मौका मिल जाता है।
इसके विपरीत पुरुष शब्द में स्वं को शक्तिशाली होते हुए भी विनम्र बनाये रखना,पुरुषार्थी बनना और स्त्री के प्रति
सम्मानपूर्ण व्यव्हार रखने का भाव अपेक्षित होता है।
तो जो भी ख़ुद को मर्द के नाम पर राक्षस बनाने में लगे हैं वो मर्यादा पुरषोत्तम भगवान राम से सीखें पुरुष होना,
महापुरुष होना,स्त्री का सम्मान करना,राजा होते हुए भी एक सामान्य ,सहज और सरल इंसान होना।
यदि 'मर्द 'शब्द से आपके भाव सहज नहीं हो पा रहे हैं ,आप एक उद्दंड इंसान बन रहे हैं,आप में बुराइयाँ आ रही हैं
तो त्याग दीजिये इस शब्द को।पुरुष कहिये और समझिये ख़ुद को।
शायद पुरुष भाव आते ही आपके मन में स्त्री जाति के प्रति सम्मान की भावना आ जाये।
आंतरिक शक्ति (जो कि पवित्रता से पैदा होती है )वो आ जाये। व्यर्थ का हु हल्ला,धमा चौकड़ी ,छिछोरापन,
छपरीपना चला जाये और एक शालीन व्यव्हार वाले,मनमोहक पवित्र चरित्र वाले पुरुष बन जाएं आप.ऐसे पुरुष
जिसमे स्वं को शक्तिशाली दिखाने की ज़रूरत ही ना हो बल्कि आपकी चारित्रिक श्रेष्ठता से वो स्वतः प्रमाणित हो
जाये।
देखिये !ये गौर करने योग्य बात है कि किसी भी महिला को बाहर से ताक़तवर दिखने वाला और भीतर से एकदम
ख़ाली (नैतिक गुणों और आत्मबल से शून्य )व्यक्ति कभी पसंद नहीं होता है।
एक पुरुष चाहे वह पिता,भाई ,पति या मित्र किसी भी रूप में हो पवित्र आचरण वाला और भीतर से शक्तिशाली
और उजला ही पसंद होता है।
बाकी आज के समय में तो कुछ बुद्धिहीन लोग केवल बाहर से शक्तिशाली दिखने वाले ,व्यसनी
चरित्र हीन और उद्दंडी लोगो को भी पसंद करके उनके फॉलोअर बने हुए हैं।ये अलग बात है कि ऐसे इंसान सिर्फ़
उसी रूप में ही इंसान हैं जैसे कि किसी पशु का नाम 'इंसान 'रख दिया जाये लेकिन वह अपने मूल गुण
धर्म को नहीं भूलता है ।
आज विवेकहीन कुछ लोग मर्द होने का मतलब समझते हैं कि तेज रफ़्तार में वाहन चलाना,बात-बात में आक्रामक
हो जाना,महिलाओं को कमज़ोर मानकर उनको अपमानित करना,स्वं को उनसे विशेष समझना,अनावश्यक
शक्ति का दिखावा करना।
जबकि वास्तविकता में और सही अर्थ में देखें तो मर्द होना मतलब मर्यादित आचरण वाला होना है।पुरुषत्व से युक्त
होना है।
ऐसी ताकत से युक्त होना है जो दुष्टों का नाश करने हेतु हो और कमज़ोर की रक्षा हेतु हो। जो शक्तिशाली हो कर
भी सहज और उदार बना रहे। जिसे अनुशाषित रहना आता हो जिसका अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण हो। जो अपने
पौरुष बल का धर्म की रक्षार्थ उपयोग करे।
इसलिए इंसान के रूप में जन्म मिला है तो मर्द के इसी अर्थ को जीने की कोशिश कीजिये,इसे सार्थक कीजिये,पशु
या राक्षस बनकर मत गँवाइये ये दुर्लभ मानव जन्म।

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