'स्वरचित कुछ शेर'
सब फूलों में एक सी ख़ुशबू नहीं मिलती
कुछ खास बात है आपमें जो औरों में नहीं मिलती ||
मलबूस ओढ़ा करे इंसानियत का तो क्या
नियत तेरे जैसी साफ़ -सुथरी इस जहाँ की नहीं
तेरी वफ़ा ,तेरे प्यार की क़ायल हूँ मै
सनकी लोग हमे कहें कोई परवाह नही ||
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गुलशन ए मोहब्बत वीरां था अब तक
ए मसीहा मेरे तुम गुल बनके महके हो ||
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इस जहाँ में तू उस जहाँ में ख़ुदा है
दोनों की इवादत से मिली है मोहब्बत
कब लगा है तू और ख़ुदा जुदा हैं ||
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सँभाल के रखती हूँ दिल में तेरी हर बेपरवाही को
बेवजहा ही तुम मुझे 'लापरवाह 'नाम देते हो .|
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उससे मेरा मिजाज़ अलग था
ना मेरी उससे, ना उसकी मुझसे बनी
बातें जब भी हुई बस अनबनी,अनबनी सी हुई .|
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क्यों बोए रखते हो दिलों में नफरत के बीज
अच्छी फसल में क्या खरपतवार अच्छी लगती है |
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वो जो तेरी वफ़ा पर हज़ार पहरेदारियाँ रखता है , टूट कर चाहने की एक अदा ही तो है .|
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ना कर इतनी मोहब्बत मुझसे कि मेरी हर
सांस भी तेरे इशारे की मोहताज हो जाए .|
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रख शिकायतें मुझसे मगर
गैरों की तरह अन्दाज़ ना रख
बढ़ती है दिल की पीर बहुत
लफ़्जों की पैनी तल्वार ना रख .|
गैरों की तरह अन्दाज़ ना रख
बढ़ती है दिल की पीर बहुत
लफ़्जों की पैनी तल्वार ना रख .|
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ना रंजिश थी उनसे कोई ख्वाबों ,खयालों में
किस हक से न जाने वो दुश्मनी निभा गए .|
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वो हमसे उम्मीद लगाए बैठे थे और हम उनसे
वो भी हमसे छुपाए बैठे थे और हम उनसे
सितम देखिए अब दोनो पर ही
चोट वो भी खाए बैठे हैं हमसे और हम उनसे|
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अंशु चौहान

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