'अविरल बहती धारा हूँ'




अविरल बहती धारा  हूँ  ना  मुझमें तुम रुक पाओगे

जितना मुझमें डूबोगे ,उतना ही खोते जाओगे 

स्पंदन प्रखर हो जाएंगे ,शब्द  शून्य -प्राण  हो जाएंगे 

खोकर मेरी स्मृतियोँ में ,भाव प्रबल हो जाएँगे 

फिर हो स्वीकृत ,आभार रहित,आना  

इस मन के प्रांगण में,

अतिथि सा सहज मन भाव लिए,  

अवसाद रहित अहसास लिए, स्व मत से 

विलग हो जाओगे|    

अविरल बहती धारा हूँ ना मुझमें तुम रुक पाओगे

-अंशु चौहान


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो

भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें'