'भक्ति रस'
'भक्ति' सांसारिक मोह-माया से ग्रसित लोगों के लिए हास्यास्पद व उपयोगिता शून्य हो सकती है परंतु जिसने इस रस का पान कर लिया है वही जान सकता है इसकी मधुरता व सांसारिक चीजों की रस हीनता .ये ऐसा भाव है जो ईश्वर की विशेष कृपा प्राप्त व्यक्तियों को ही मिलता है.ये बखान करने का नहीं अनुभव करने का विषय है. भक्ति किसी भी व्यक्ति पर थोपी नहीं जा सकती.इसे तो सरल, भावुक ह्रदय व प्रभु प्रेमी ही समझ सकते हैं.ये तो वो दुर्लभ उपहार है जिसके आगे महंगे -महंगे रत्न तुच्छ लगने लगते हैं.जिसके आगे संसार की कोई चीज़ मोहक नहीं लगती है.ये तो वो नशा है जो महलों की रानी को सम्पूर्ण ऐशवर्य को ठुकराकर जोगन बनने को मजबूर कर दे.जो एक मूर्ख को विद्वान व महाकवि बना दे.इसे तो ऐसे ही कुछ विशिष्ट जन प्राप्त कर पाते हैं अन्यथा तो अधिकतर प्राणी महामाया के आदेशनुसार चलकर सांसारिक चीजों के मोहपाश में बंधे रहते हैं.आधुनिक (कलयुगी लोगों ) की नज़र में 'भक्ति' हास्य ,निराशावाद (depression)और पिछड़ेपन से ज़्यादा कुछ नहीं है.मगर ये समझपाना इन लोगों के लिए इतना आसान नहीं है कि वास्त्विक सफलता ,आशा ,उन्नति और जीवन का असली अर्थ तो इन्ही भक्तों ने समझा है.
आत्मा के स्तर पर तो ज़िन्दगी इन्होने ही जी है बाकी तो शरीर तक ही सीमित रहे.
'भक्ति'का अर्थ घरवार छोड़कर किसी पहाड़ी पर बैठ जाना नहीं है बल्कि संसार में रहते हुए भी सर्व कर्म ईश्वर को समर्पित करते हुए व निष्काम भाव से करना है.अव्यर्थ कालत्वं है,विरक्ति है,मानशून्यता है,आशाबंधन(केवल ईश्वर के प्रति आशावान ) है.कलियुग में मुक्ति का 'भक्ति' से श्रेष्ठ कोई मार्ग नहीं है.'भक्ति' को ईश्वर प्राप्ति का सबसे सुगम व उच्च मार्ग बताया गया है.मनुष्य योनि में जीव इसकी उपादेयता समझता नहीं है और अन्य योनि में ये संभव नहीं है इसलिए जितना समय मिले इसे ईश्वर ध्यान में लगा दें.हर कर्म करते हुए उसे याद रखें.भक्ति की कोई उम्र निर्धारित नहीं की गई है जब जागृत हो जाए ,जिस उम्र में जग जाए बस आरम्भ कर दें.जीवन अमूल्य है,समय अमूल्य है. इसे व्यर्थ ना गवाएं.किसी भी व्यक्ति को अपनी 'जीवन अवधि' का ग्यान नहीं है इसलिए भक्ति को बुढ़ापे से जोड़ना सही नहीं है.
-अंशु चौहान
जय श्री राधे-कृष्णा 🙏

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