शत्रुता


'शत्रुता' एक ऐसा भाव है जो यदि किसी के प्रति दिल में पनप जाए तो उससे कहीं ज़्यादा स्वं के लिए घातक 

हो जाता है.ये ऐसा ज़हरीला भाव है जो सोचने समझने की क्षमता तक नष्ट कर देता है।

विवेक हनन कर लेता है और सर पर बदला लेने का, खून सवार कर देता है।

ये व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव डालता है.

इस भाव की उत्पत्ति होती है इन छोटे-छोटे भावों से जैसे-द्वेष,ईर्ष्या,असंतोष,तिरस्कार,असहिष्णुता,अपेक्षा,उपेक्षा 

आदि।

इस  भाव से सबसे ज़्यादा हानि खुद ही की होती है,फिर भी क्षमाशीलताऔर क्रोध पर नियंत्रण की कमी के कारण 

हम इसके दुष्परिणाम झेलने के लिए भी तैयार हो जाते हैं और इसके सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं.

इस भावना के वशीभूत इंसान अपने शत्रु का या तो शारीरिक या मानसिक रूप से बुरा करने पर उतारू हो जाता 

है। 

कई बार ये भाव किसी ग़लतफ़हमी से भी उत्पन्न हो जाता है जिसका व्यर्थ ही ख़ामियाज़ा उस निर्दोष को भुगतना 

पड़ता है जो इस भाव का  बेवजह शिकार हो जाता है। 

शत्रुता की वजह कुछ भी हो इसे दिल में जितना सहेज कर रखा जाएगा,उतना ही सेहत और कार्मिक दृष्टि से 

हानिकारक होगा।

देखिए आपको अपने शत्रु को ख़त्म नहीं करना है बल्कि उसके प्रति अपने दिल में पल रहे शत्रुता के भाव को ख़त्म 

करना है और इस नीति का पालन किसी एक पक्ष के लिए नहीं वरन दोनों द्वारा ही किया जाना अपेक्षित है।

ये नियम दोनों पर ही लागू होता है.किसी के प्रति भी इस भाव को इतना न बढ़ने दें कि एक दूसरे के रक्त पिपासू हो 

जाएँ या तंत्र-मन्त्र का सहारा लेकर उसका  किसी भी तरह से अहित  करने की सोचने लगें।  

आप अगर इस तरह की प्रार्थना भी कर रहे हैं तो इसका मतलब ये होना चाहिए कि आपके शत्रु के दिल में जो 

आपके प्रति शत्रुता पूर्ण भाव है उसका नाश हो,ना की आप उसकी मृत्यु की या उसका कुछ बुरा होने की दुआ 

आदि करें.

आप उसे शारीरिक हानि पहुँचाएंगे या कुछ भी बुरा होने की दुआ करेंगे तो आपका ही कार्मिक अकाउंट गड़बड़ 

होगा। 

गीता के अनुसार कार्मिक अकाउंट के हिसाब से हर व्यक्ति को उसके कर्मों का दंड  मिलता रहता है।जिस व्यक्ति 

के प्रति आपने ग़लत किया होता है वह किसी न किसी रूप में आपके सामने आता रहेगा जब तक कि उसका 

बदला पूरा नहीं हो जाता। 

मतलब आप दोनों पक्ष  एक दूसरे को मन से माफ़ नहीं करेंगे तब तक ये  ख़त्म नहीं होगा। इसलिए इसी जन्म में 

क्षमा करके सदव्यवहार से एक दूसरे को स्वीकार कर लीजिए।हाँ अगर आप में ताक़त है यातनाओं के इस 

सिलसिले को झेलते  रहने की हर जन्म में ,और ईश्वर के कोप का भाजन बनने की, तो बेशक़ अपना व्यवहार न 

बदलें।

न्याय-अन्याय का फ़ैसला न्यायालय व ईश्वर पर छोड़ दें क्योंकि शत्रु से बदला लेने का एकमात्र तरीका अगरआपको 

लगता है कि हत्या करना है,तो ये सिलसिला तो कभी ख़त्म नहीं होगा।बदले की भावना कभी ख़त्म नहीं होगी। 
 
यदि कोई भी ये समझता है कि अपने शत्रु कि हत्या करके वह सुकून पा सकता है या समस्या का समाधान हो 

सकता है तो ये सरासर ग़लत है.शत्रु ख़त्म करने का एकमात्र तरीका है कि शत्रु से मित्रता कर लें अथवा उसके प्रति 

शत्रुता पूर्ण भाव को क्षमा भाव  द्वारा नष्ट  कर लें। 

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