सोचना तो पड़ेगा
बड़ी पीड़ादायक बात है कि समाज में कुछ व्यक्ति मर्यादा और अनुशासन को बोझ मान कर मनमानी स्वतन्त्रता और
उद्दन्डता के पक्षधर होते जा रहे है.ऐसा कोई भी आचरण ज़िसमे आत्मानुशासित होना पड़े उनको कष्टप्रद लग
रहा है.मानसिक पवित्रता गायब सी होती जा रही है.ये लोग बस भोग-विलास के लिए प्रयासरत है.नैतिकता की बात
इनके लिए मज़ाक से ज़्यादा कुछ नहीं हैं.संस्कारो की बात पिछड़ापन हैं,अवैज्ञानिक हैं.भलाई की बात करने वाला
इनका सबसे बडा शत्रु है .आध्यात्मिक बातें करने वाला इनकी दृष्टि में सबसे बड़ा मनोरोगी है .
अब ऐसे में सब कुछ उसी के ( प्रभु के) हाथ में है,उस परम सत्ता के. वरना सच कहूँ तो इस समय समाज में कुछ
चीज़ें, बड़ी ही घृणास्पद व असहनीय घट रही हैं।
लिवइन रिलेशनशिप,रेप,हत्या इनसे सम्बंधित समाचार ही प्रमुखता से सब जगह पढ़ने और सुनने को मिल रहे हैं.
मर्यादा में रहना ऐसे लोगों के लिए इतना मुश्किल हो रहा है कि ये लोग इस पीड़ा से बचने हेतु विभिन्न प्रकार की
सुविधा और स्वतन्त्रता हेतु अपने दिमाग का दुरूपयोग कर रहे हैं.
ऐसी ही खुराफात से जन्मी है लिवइनरिलेशनशिप धारणा.
इन लोगों को मर्यादित आचरण पसंद नहीं है,आत्मानुशासन,संयम पसंद नहीं है.इनको तो छूट चाहिए हर उस
बन्धन से जो आचरण को मर्यादित करे.हर उस विचार से जो नैतिकता में बांधने की कोशिश करे.
इनका उद्देश्य है दकियानूसी या पिछड़ा हुआ सिद्ध करना , हर उस व्यक्ति को जो पवित्र आचरण और उसूलों की बात करे.
अगर इन्द्रिय सुख को इतनी तबज्जो दी जाने लगे कि उसके हित हमें कानून बनाने पड़े और आत्मिक उत्थान के
लिए कोई प्रयास ना हो तो मनुष्यता को जीवित रखना असंभव है.बिना अनुशासन के पशुवत ही जीना है तो खुद
को मनुष्य समाज का नहीं पशु समाज का निर्माता और अंग मानना होगा.
इन्द्रिय सुख और इससे संबंधित अधिकारों पर ही पहले तो प्रबलता से जोर देना और फिर जब कोई नैतिकता
विहीन आचरण कर इनकी प्राप्ति हेतु कदम उठाये तो उसे दन्डित करने की व्यवस्था की जाये.ये निहायत ही
हास्यास्पद है.
ये वैसे ही हुआ जैसे कि कोई कहे कि अमुक चीज आपके स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं है और आपके टिफिन में
वही चीज परोस दी जाये.
इसलिए किसी भी ऐसे मत या विचार को जो संस्कृति के लिए,सभ्यता के लिए हानिकारक हो उसे कानून मत बनने
दीजिये. संस्कृति,सभ्यता,नैतिकता और मानवता को बचाने की कोशिश कीजिये.हमें दुर्लभ मनुष्य जन्म खा-
पीकर,मौज-मस्ती करने,दावतें करने,नाती-पोतो को खिलाने ,फिल्मे देखने,पिज्जा-बर्गर खाने,व दौलत- शोहरत
कमाकर एक लोटे में सिमटकर निकलने के लिए व वापस जनम-मरण में फंसने के लिए नहीं मिला हैं .इस जन्म
को भगवान ने भगवत प्राप्ति हेतु दिया है.
समझ सको तो इसकी महत्ता को समझो.एक-एक पल यूँही व्यर्थ जा रहा है अगर प्रभु चिंतन आपके जीवन में नहीं
है,परोपकार की भावना नहीं है,आपकी पूँजी का कुछ हिस्सा अगर किसी ज़रूरतमन्द के काम नहीं आ रहा है
तो याद रखिये।
-अंशु चौहान

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
allowed