'विकास नहीं पतन है ये'


कहने को तो अब हम विकसित सभ्यता के मनुष्य हैं।सारी  सुविधाएँ और साधन रखते हैं फिर भी यूँ लगता है कि 

सोच का विकास सही से नहीं हो पाया है,या यूं कहें की सोच की दिशा गलत हो चुकी है। सब कुछ होते हुए भी 

अभाव ग्रसित सी ज़िंदगी जीना ,संपन्न संस्कृति होते हुए भी 

संस्कार हीन ,मूल्य विहीन सा जीवन जीना न जाने क्यों चुन रहे हैं इसे हम पैसे होते हुए,फैशन के नाम पर कटे -

फटे कपड़ें पहनना ,कपड़ा होते हुए भी छोटे -छोटे कपड़ें पहनना ये हमारा विकास है या पिछड़ापन। 

 पहले किसी ग़रीब व्यक्ति के फटे हुए कपड़े देख कर उस पर दया की जाती थी या किसी भी अन्य व्यक्ति के फटे 

कपड़े देखकर उसकी आर्थिक स्थिति का आँकलन किया जाता था परन्तु अब अपनी मर्ज़ी से साबुत कपड़ों को 

फाड़ा जाता है और जगह-जगह कुतर कर हम अपने को स्टाइलिश और आधुनिक मानने लगते हैं। 

ये आधुनिकता है तो आदिवासी  लोग तो हमसे ज़्यादा आधुनिक हैं।

इधर-उधर से कुतरे कपड़ों को पहन कर हम पूरे आत्म विश्वास के साथ चलते  हैं और साबुत कपड़ों में हीनता का 

भाव महसूस करते हैं।

मानसिकता का इससे ज़्यादा गिरा हुआ स्तर और क्या होगा।व्यक्तित्त्व का इससे ज़्यादा पिछड़ापन और क्या होगा।

मतलब फैशन की दुनिया में कुछ भीअटपटा शुरू हो जाये तो तत्काल अनुकरणीय हो जाता है कम विवेक वालों के 

लिए.न नैतिकता देखनी है ,न मर्यादा बस अंधानुकरण और अंग प्रदर्शन ही प्रमुख हो जाता है। 



क्या आप जानते हैं कि संपन्न होते हुए भी अगर आप फटे पुराने या मलिन वस्त्र पहनते हैं तो धीरे-धीरे मां लक्ष्मी 

आपके पास  से रूठ कर जाने लगती हैं। केतु रुष्ट होने लगता है। काफ़ी ग़लत प्रभाव ग्रहों के होने लगते हैं।

सबसे विचित्र बात तो ये कि इतने असज कपड़ों में आप जो सहज महसूस कर  पाते हैं वो आपकी सोच की रुग्णता 

को दर्शाता है।  

कई बार कुछ नयी चीज़ें आकर्षित तो करती हैं लेकिन विवेक अगर हावी होगा तो आप उस नई किन्तु बेतुकी चीज़ 

या परिवर्तन को स्वीकार नहीं करेंगे। हर वक्त भेड़ चाल चलना ,दूसरों को अनावश्यक फॉलो करना सही नहीं है। 

अपने अलग सिद्धांत रखिये ,अपने मन को बुद्धि  पर हावी मत होने दें।मन हर वक़्त सहज और भरमाने वाली चीज़ों 

को ही चुनता है। ,देखिये  सभ्यता और तकनीकी विकास के बाद कई चीज़े अच्छी और कई बुरी सामने आई हैं।

जहाँ आधुनिकता ने हमारी ज़िंदगी को सरल और आरामदायक बनाया है वहीँ हमारी आदतों और आचरण को 

ख़राब भी किया है। यही कारण है कि हम वापस से कुछ प्राचीन चीज़ों की तरफ़ बढ़ रहे हैं।

उन्ही पुरानी  चीज़ों और पद्धतियों  की तरफ़ जा रहे हैं। जैसे मिटटी के बर्तन ,मिटटी के चूल्हे की ओर। आश्रम की 

ओर। गुरुकुल शिक्षा और झोपड़ी की ओर। क्योंकि ये सिद्ध हो चुका है कि यही सब लाभदायक है जीवन के लिए। 

इसलिए मूर्खता पूर्ण चीज़ों ,ग़लत परिवर्तन को मत अपनाइये। बुद्धि -विवेक का उपयोग करिये फिर ही किसी चीज़ 

को चुनिए।क्यों किसी के भी हाथ की कठपुतली बन कर अपने व्यक्तित्व का कचरा करते हो। किसी और के थोपे 

हुए फैशन को नहीं अपने विवेक द्वारा चयनित ,मर्यादित वेश-भूषा को अपनाइये।बेहूदगी दिखाकर आधुनिक भी 

कहला गए तो हुए तो धूर्त ही,किसी अन्य के हिसाब से चलने वाले जोकर ही।इसलिए मत मूर्ख बनिए ,अपने अलग 

सिद्धांत रखिये ,पिछलग्गू मत बनिए किसी के।बिना विवेक के कुछ भी मत करिये।   


याद रखिये आधुनिकता और समानता का मतलब ये नहीं है कि कुछ भी अनर्गल करने और जीने की स्वतंत्रता 

बल्कि नैतिक और भौतिक उन्नति में बाधक ग़लत नीतियों को त्यागना व उनका विरोध करना है। जहाँ तक स्त्री 

पुरुष समानता के अधिकार की बात है तो स्त्री की स्वतंत्रता की मै भी पक्षधर हूँ पर स्त्री की अपनी मर्यादा होती हैं,

जिन्हे उसको निभाना ही चाहिए।प्रकृति ने भी स्त्री को शारीरिक दृष्टि से पुरुष से कुछ भिन्नतायें प्रदान की है जिसके 

रहते उसे अपनी नारी सुलभ शालीनता बनाये रखना ज़रूरी या अपेक्षित है। ये मर्यादा भी हमारी भारतीय संस्कृति 

में नारी की श्रेष्ठता व् उसके उच्च चारित्रिक व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा बनाए रखने हेतु है वरना विदेश में तो उनके शराब  

पीने ,नशा करने ,अवैध सम्बन्ध आदि पर भी कोई ऑब्जेक्शन या आपत्ति नहीं है।इसीलिए तो हमारी संस्कृति 

पूजनीय है क्योंकि यहाँ रानी पद्मावती ,अहिल्या, रानी लक्ष्मी  बाई आदि जैसी उच्च चरित्र की महिलायें हुई हैं।

जब पुरुष  से भी ज़्यादा उच्च स्थान वैदिक युग से नारी को दिया जाये तो उसे अपनी गरिमा बनाये रखने के लिए 

शास्त्र संवत व्यव्हार करना और अपनी मर्यादाओं का पालन करना ही चाहिए।इसलिए  शालीनता युक्त कोई भी कपड़ा 

पहनिए मगर अंग प्रदर्शित करती हुई ,ऐसी कोई वेश-भूषा न पहने जो  पुरुषों पर भी अभद्र लगे। 

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