''स्वच्छ बनाये भारत''

 








 

ईश्वर  द्वारा प्रदत्त सबसे सुन्दर उपहार है 'प्रकृति'।हमारी पवित्र नदियाँ जिनका पवित्र जलआचमन कर हमारे ऋषि- 

मुनि तृप्त हुआ करते हैं,जो पहाड़ हमारे ऋषि-मुनियों और संतों के आश्रय स्थल रहे हैं। 

इन सबके प्रति हमें नतमस्तक होना चाहिए,सम्मान का भाव होना चाहिए और इनकी सुरक्षा के प्रति हमें सजग होना चाहिए।

इन सब की सुरक्षा का ज़िम्मा हमारा है आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही प्रकार से।

इसलिए हम जब भी कहीं घूमने जाएँ तो इनकी स्वच्छता का पूरा ध्यान रखें और इनकी महिमा,इनकी महत्ता से 

सबको अवगत कराते रहें।

बड़ा दुःख होता है कि हमारे अंदर अपनी इस धरोहर को सहेज कर रखने का भाव नहीं है। हम इनके प्रति अपना 

कोई दायित्व नहीं समझते हैं।

हम दावे तो करते हैं देश प्रेम के व इस पर मर मिटने के लेकिन देश को स्वच्छ और सुन्दर 

बनाने के लिए कोई प्रयास नहीं करना चाहते। हम कहीं भी घूमने जाते हैं  वहाँ खाने-पीने की चीज़ो के खाली रैपर 

छोड़ आते हैं। डस्टबिन होते हुए भी उसका उपयोग नहीं करते सिर्फ आलसी और लापरवाही  वृत्ति के कारण। 

पवित्र नदियों में गन्दी चीज़े फेंक आते हैं। 

हमने गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों के जल को भी दूषित कर दिया 

है। हम इन नदियों को माँ सम्बोधित करते हैं, तो माँ के प्रति इतना गन्दा रवैया क्या सही है ?

यमुना नदी की दशा देख कर तो मन बहुत ही दुःखी होता है।

झाग युक्त इतना प्रदूषित पानी कैसे हम देख पाते हैं इतनी लापरवाही ? 

क्यों हमारी बुद्धि इतनी मलिन और क्षीण हो जाती है कि हमें ये ग़लत नहीं लगता।

क्या हमारे मन और कर्म में इतनी मलिनता आ गई है कि हम इसे बड़ी ही सामान्य बात लेकर चलते हैं? 

यमुना नदी की साफ़-सफाई पर कई हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च हो चुके हैं लेकिन स्थिति वैसी की वैसी बनी हुई है। 

यमुना का जल ज़हरीला हो चुका है। जब तक आप और हम जागरूक नहीं होंगे ,हर एक व्यक्ति जिम्ममेदारी नहीं 

समझेगा कुछ नहीं हो सकता। 

हमारी आख़िर स्वच्छता से दुश्मनी क्या है ?हमें क्यों गंदगी में रहने की आदत हो गई है।क्यों हम जगह-जगह थूकते 

रहते हैं ?क्यों हम कहीं भी खड़े होकर बीड़ी -सिगरेट फूँकते रहते हैं और फिर उन्हें इधर -उधर पटक दिया करते 

हैं। क्यों हम जानवरों को सडक़ पर खुला छोड़ देते हैं?क्यों हम उनके लिए किन्ही विशेष सुरक्षित स्थानों की 

व्यवस्था नहीं करते। क्यों हमारी व्यवस्था ,हमारा तंत्र भी कुछ नहीं कर पाता?


हम क्यों नहीं देखना चाहते अपने देश में चमचमाती सड़कें ,पवित्र जल वाली नदियाँ ,सुन्दर पहाड़ ,सुरक्षित पशु 

,लहलाते सुन्दर खेत,वादियाँ ,पवित्र जल ,साफ़-सुथरे जल की पौष्टिक सब्ज़ियाँ। स्वच्छ ,प्राणदायक वायु। 

क्या हम ख़ुद के ही दुश्मन नहीं हो रहे हैं ?


हमें बीमार होना मंज़ूर है,गन्दी सब्ज़ियाँ खाना मंज़ूर है ,गन्दी ,प्रदूषित हवा में रहना मंज़ूर है ,हमें डॉक्टर के पास 

जाकर महंगी दवाइयों पर तमाम रुपये खर्च करना  मंज़ूर हैं,पर अपनी आदतों को सुधारना नहीं। 

देश को स्वच्छ रखना नहीं। हमारे लिए सब कुछ संभव है लेकिन अपनी वृत्तियों को सुधार कर अपने देश के प्रति 

ज़िम्मेदारी निभाना नहीं।  

देश भक्ति के बड़े -बड़े नारे लगा लेंगे ,देश के लिए मर मिटने की बड़ी -बड़ी बातें कर लेंगे ,देश भक्ति गीत गा  लेंगे 

मगर गुटखा खाकर जगह-जगह थूकना और गाड़ी का शीशा ऊपर कर गाड़ी से कचरा फेंकना नहीं छोड़ेंगे। 


हम दूसरे देशों की सुंदरता के भरपूर गीत गाएँगे मगर अपने देश को सुन्दर बनाने का प्रयास नहीं करेंगे। 

अपने देश को छोड़ कर दूसरे देश में बसने की सोच लेंगे मगर यहाँ रहकर इसे खूबसूरत बनाने की नहीं सोचेंगे। 



अगर आपको अपने देश से प्रेम है ,आप में देश भक्ति की भावना है तो इसके प्रति अपने दायित्व को समझिये। इसे 

आप भारत माता कहते हैं तो इस माँ का आदर कीजिये। माँ की गोद को पवित्र रखिये।इसमें कचरा मत भरिये। 

इन सब चीज़ों का ध्यान रखिये और फिर गर्व के साथ कहिये मै भारतीय हूँ। सच्चा भारतीय।

मुझे अपनी माँ पर गर्व है। मुझे अपने भारत देश पर गर्व है। इसका निवासी होने पर गर्व है. 




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