'शुद्ध भक्ति'









'शुद्ध भक्ति ' शब्द को सुनकर मन में सभी के दिल में ये ख्याल तो ज़रूर आया होगा की भक्ति में शुद्ध और अशुद्ध 

का क्या मतलब हुआ। दरअसल भक्ति में शुद्ध और अशुद्ध का सम्बन्ध भक्त की भावना से होता है।

भक्त भी दो तरह के होते हैं- एक वो जो अपनी तमाम इच्छाओं की पूर्ती हेतु भक्ति करते हैं,जगह जगह के मंदिरों में 

जाकर पूजा अर्चना करते हैं,धोक लगाते हैं कि अमुक समस्या या दुःख खत्म हो जाएगा तो इतने का प्रसाद चढ़ाएंगे 

या कोई भी कार्य।कुछ मामलो में तो दूसरों के अहित की कामना से भी कुछ लोग पूजा करते हैं.


सही इच्छाओं की पूर्ती के लिए की गई पूजा में  कोई बुराई नहीं है लेकिन ग़लत इच्छाओं के लिए की गई पूजा भी 

पाप कर्म में ही आती है।सबसे निकृष्ट लोग वही होते हैं जो भक्ति की आड़ में अपनी ग़लत इच्छाओं की पूर्ती की 

कामना रखते हैं।इनकी कोई कामना तंत्र -मंत्र से पूरी हो भी जाये तो ऐसे लोगो का अंत बड़ा भयावह होता है।

ये ज़िंदगी मौत के बीच में झूलते रहते हैं और बड़ी ही दर्दनाक मौत होती है इनकी,और प्रेत योनि में जाते हैं।




दूसरी भक्ति होती है-निःस्वार्थ भक्ति जिसमें कोई इच्छा नहीं होती।बस प्रभु के प्रति 

समर्पण और लगाव होता है.उन्ही को पाने की इच्छा होती है बस।ऐसे भक्त को ही वैष्णव कहा जाता है। 

जिनकी सांसारिक इच्छाएं नष्ट हो जाती हैं,ऐसी भक्ति करने वाले होते हैं शुद्ध भक्त।ये भक्त दुःख आने पर 

भगवान से शिकायत नहीं करते और सुख आने पर ज़्यादा उछलते नहीं हैं।


शुद्ध भक्त ही भगवान को अति प्रिय होते हैं जैसे -भक्त प्रह्लाद जी,मीरा जी,माधवदास जी,रसखान जी आदि कई 

भक्त हुए हैं।

शुद्ध भक्त प्रभु को इतने प्रिय होते हैं की उनके लिए वो कई नियम भी तोड़ देते 

हैं क्योंकि शुद्ध भक्त बहुत पवित्र हृदय के होते हैं।

अगर भगवन के शुद्ध भक्त से कोई मानसिक या प्रकट रूप में 

कोई बैर भाव रखता है या उसका बुरा सोचता है तो प्रभु उसे कभी माफ़ नहीं करते क्योंकि कहा जाता है कि  

''स्वं का मान भले टल जाये पर भक्त का मान न टलते देखा... ।अर्थात खुद का अपमान प्रभु सहन कर लेते हैं पर 

अपने भक्त का नहीं।

इसलिए शुद्ध भक्त ही श्रेष्ठ होता है जिसे प्रभु प्राप्ति की इच्छा होती है, बस बाकी किसी चीज़ का मोह 

नहीं होता।


देखिये भक्ति किसी पर थोपी नहीं जा सकती न ही ये प्रदर्शन अर्थात दिखावे का विषय है।भक्ति तो एक 

भाव है जो पूर्व जनम के या इस जन्म के किसी पुण्य से मन में जागृत होता है।एक शुद्ध भक्त पर किसी तंत्र विद्द्या, 

जादू -टोने का कोई प्रभाव नहीं होता।

उस पर जो कष्ट आते हैं वो उसके पिछले कई जन्मो के संचित कर्मो का जल्दी से निपटारा करने हेतु प्रकट होते हैं।

शुद्ध भक्त हर वक्त प्रभु की गोद में होता है.उसे प्रभु गिरने नहीं देते।


गलत तरीके से पूजा-पाठ करवा कर,किसी का 

अहित करवाने वाला कोई भी ,कभी भक्त हो ही नहीं सकता ।

ऐसी पूजा तो राक्षस करते आये हैं और राक्षसों का तो दुखद अंत ही हुआ है सदा।इसीलिए ग़लत इरादे से किसी पर 

तंत्र -मंत्र,जादू टोना करने वालो की बड़ी दुर्गति होती है।कोई भगवत भक्त ही दया करके इनका उद्धार कर सकता 

है वर्ना तड़पते रहते हैं जन्मो तक।

भक्ति में तो मन शुद्ध होता है ,द्वेष खत्म होता है,क्षमा का भाव आने लगता है 

अहम् नष्ट होने लगता है,प्रार्थनाएं दूसरों के कल्याण की होने लगती हैं। 

अगर ऐसा नहीं है तो अगरबत्ती ,दिया ,धूप करना,दान,तीर्थ यात्रा करना सब व्यर्थ है। प्रभु को सीधे सादे लोग पसंद 

हैं या यूं कहें की भोंदू।जिसमे चालाकी न हो,बुद्धिमान होने का भाव न हो। 

इसलिए तो प्रभु भक्त सारे भोले ही हुए हैं।

जो संसार में नहीं प्रभु में ज़्यादा रमते हों,फालतू इच्छाएं न पालते हों वही शुद्ध और प्रिय भक्त है प्रभु का।


यज्ञ हवन,पूजा-पाठ करने या मंदिर जाने से 

कुछ नहीं होगा।बस हर वक्त दिमाग में प्रभु चिंतन और उनकी कथाये ,उनके दर्शन की अभिलाषा हो तो आप शुद्ध 

भक्त हैं।तो कोशिश कीजिए शुद्ध भक्त होने की अगर प्रभु को पाना है तो,वर्ना लगे रहिये कीड़े ,मकोड़े बनने 

में.,आने -जाने के चक्र। 


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