'असमानता क्यों '
समाज में कुछ चीज़े बड़ी अव्यवस्थित और अतार्किक हैं।
पहले लड़की-लड़के में भेद की मानसिकता थी तो लड़किया दुखी और त्रस्त थीं।
अब लड़कियों को इतना प्रोटेक्ट किया जा रहा है की लड़के असुरक्षित हो गए हैं।
ऐसे ही कहीं बुजुर्गों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा की बात की जा रही है तो उन बहुओं के साथ अन्याय हो रहा है
जो अपने ऊपर उन अत्याचारों को झेल चुकी हैं जो सास ने अपनी बुढ़ापे से पहले की उम्र में किये हुए थे।
अब सास के पास तो बुढ़ापे की उम्र की सहानुभूति है स्वं के लिए लोगों से,परन्तु बहु को जो मानसिक बीमारियां
और शारीरिक बीमारियां उसकी वजह से मिली उनको समझने और सुनने वाला कोई नहीं।
अब ऐसी स्थिति में विवाह से पहले बालक-बालिका असमानता को झेलने वाली उन बालिकाओं की स्थिति पर ज़रा
विचार कीजिये जो विवाह से पहले भी असमानता की वजह से पारिवारिक सुख से वंचित रही और विवाह के बाद
ससुराल में बहु से की जाने वाली सारी अपेक्षाओं की वजह से बाद में भी दुखी हो रही हैं।
क्या हर परिवार की स्थिति और परस्थिति समान होती हैं ? नहीं !
सबको अलग-अलग माहौल और सुविधा-असुविधा मिलती हैं।
फिर कोई भी कानून या नियम बनाने से पहले सब तरह की परस्थिति और संवेदनाओ का ध्यान रखना चाहिए
अन्यथा किसी परस्थिति विशेष के व्यक्ति के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो सकता है। सभी प्रताड़ित बहुओं और त्रस्त
बूढ़ो को सही -सही न्याय मिलना चाहिए। जो वास्तव में न्याय पाने योग्य हैं। स्त्री पुरुष में भी दोनों को समानता का
अधिकार मिलना चाहिए।विशेषाधिकार किसी एक के पास नहीं होने चाहिए।समानता से ही सबकी पीड़ा खत्म हो
सकती है और समानता से ही सबका कल्याण हो सकता है।कोई भी विशेष वर्ग अगर विशेष अधिकार से युक्त
रहेगा तो सबके प्रति समानता की स्थिति नहीं बन सकती।

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