'समझ'
दुनिया बड़ी विचित्र है यहां सब अपने को दूसरे से श्रेष्ठ मानते हैं और सबको ही एक दूसरे से शिकायत है।यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके सबके साथ संबंध अच्छे हों फिर भी दूसरे को खुद से निम्न और खुद को दूसरे से श्रेष्ठ मान कर चलते हैं.
जरा विचार कीजिए अगर दोनों अच्छे होते तो ना एक दूसरे से दोनों को शिकायत होती न झगड़े.सारी समस्या का कारण है अपेक्षा, उम्मीद।अगर आप किसी से उम्मीद रखते हैं कि वो आपके अनुसार बने तो आपको भी उसके अनुसार बनना होगा।अन्यथा शिकायत करना बंद करे।जब आप खुद को बदलना नहीं चाहेंगे तो दूसरे से उम्मीद क्यों? इसलिए सुखी रहना है तो इच्छाओ पर नियन्त्रण रखें।दूसरो से सुख पाने की नहीं, सबको सुख देने की इच्छा रखें.जब तक स्वार्थी बने रहेंगे, सुख भोगने की इच्छा रखेंगे और दूसरे को अपने अनुकूल बनने की कोशिश करते रहेंगे तब तक दुख से नहीं बच पाओगे.और यहीं सारी उम्मीद क्लेश, द्वेष और विवाद उत्पन्न करती रहेंगी।जब तक मेरा - मेरा का भाव ख़तम नहीं होगा तब तक दूसरे के प्रति सहनुभूति और प्रेम का भाव नहीं होगा।और स्वार्थ और अपेक्षा ही दुख का मूल कारण है।उमर के अनुसार इच्छाएं और व्यवहार परिवर्तन होना चाहिए.ताकी गृहस्थ आश्रम,वान प्रस्थाश्रम और संन्यास आश्रम का पालन हो सके। विवाद, कलह खतम हो सके.

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