संदेश

तेरी चाहत का धीमा ज़हर ,मेरी सांसो में घुल रहा कब से संभाले थे ये तबियत आज कमबख्त हर राज खुल रहा । 

हे राम कुछ ऐसा कर दो

हे राम !आचरण इस युग के नर का, भी मर्यादित कर दो लक्ष्मण रेखा जिसका हो न उल्लंघन,  नारी- हित निर्धारित कर दो ।  कब तक देखूं पतित आचरण ,नारी की ये निंदा  दो आवरण शील,दया का हे कृपालु भगवंता ।  भेद सके ना पुरुष जिसे वो रक्षा कवच बना दो , हर नारी में शुद्ध चरित्र की निर्मल चेष्टाजगा दो । निष्फल कर दे हर कुत्सित दृष्टि को ऐसा आत्म नियंत्रण भर दो , हर पुरुष को राम ,हर नारी को सीता कर दो पैदा ना हो कोई रावन फिर से इस कलियुग को सतयुग कर दो । 
मेरी ख़ामोशी को हालातों से समझौता न समझो ये जलजले बगावत के रोकने की पहल है ।