बुद्धि को सही समय पर सही दिशा दें




  1. जिसकी बुद्धि मलिन है, मानसिक स्वास्थ्य खराब है तो वो व्यक्ति कभी भी कुछ अच्छा न तो सोच सकता है और ना ही कुछ अच्छा कर सकता है.उसकी बुद्धि में इतना कुछ गलत भरा होता है कि उसे अच्छा दिखता भी नहीं है, सूझता भी नहीं है.

सबसे ख़राब चीज़ ये होती है कि ज्ञान की बातें और अच्छी सलाह तो उसे पचती ही नहीं है .

मिथ्या अहंकार,खुद को श्रेष्ठ मानकर वो अपनी अलग ही दुनिया में जीता है।ज़रा ज़रा सी बात पर उसका अहंकार आहत हो जाता है.कुल मिलाकर मानसिक विकार से ग्रसित होने के कारण वो खुद का एक काल्पनिक व्यक्तित्व बना लेता है कि बाकी सब उससे नीचे हैं और वो ही सुपर है।

ये गलत फहमी जैसे जैसे बढ़ती है उसकी बददिमागी ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ती जाती है और एक दिन वो बड़ा अपराधी बनकर तैयार हो जाता है.उसके चेहरे का तेज खतम हो जाता है .उसके व्यक्तित्व से दूर तक नकारात्मकता छलकने लगती है.वह दिन व दिन अपनी दुर्वृत्तियों के पोषण के लिए सबके साथ अभद्र व्यवहार शुरू कर देता है और ऐसे व्यवहार को जो भी समर्थन करता है कुछ दिन बाद खुद ही उसके बुरे व्यवहार का शिकार हो जाता है .

इसलिए कोई गलत है तो सुधार करें, टोकिये.सही चीज सिखाइये.वर्ना वैसी ही हालत होती है जैसी सुल्ताना डाकू की माँ की हुई थी।कहते हैं जब वह छोटा था तो एक बार कोई चीज़ चुरा के ले आया था तो उसकी माँ ने उसे डाटने की जगह शाब्बासी दी थी कि वाह बेटा बिना किसी को पता चले तू इतनी महँगी चीज़ सावधानी से चुरा लाया .बस इसी प्रोत्साहन ने उसे डाकू बना दिया और उसे जब फांसी की सजा होने जा रही तो उसने अपनी मां से मिलने की इच्छा व्यक्त की और मां के गले मिलकर उसकी नाक काट ली कि मुझे सही शिक्षा क्यों नहीं दी .इस तरह बाद में ऐसी संतान सिर्फ अपने अभिभावक को ही दोषी बताती है और उनसे नफ़रत करती है कि समय पर सही शिक्षा क्यों नहीं दी गई।

और जो बच्चे कहीं और गलत संगत से बिगड़ते हैं उनके मां-बाप ही अंत में उस अपराधी संतान के लिए प्राण दंड की कामना करते हैं इसलीये रिश्तों के पोषण में नहीं सही कर्म या धर्म के पोषण में लगिये

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