हे राम कुछ ऐसा कर दो
हे राम !आचरण इस युग के नर का, भी मर्यादित कर दो
लक्ष्मण रेखा जिसका हो न उल्लंघन, नारी- हित निर्धारित कर दो ।
कब तक देखूं पतित आचरण ,नारी की ये निंदा
दो आवरण शील,दया का हे कृपालु भगवंता ।
भेद सके ना पुरुष जिसे वो रक्षा कवच बना दो ,
हर नारी में शुद्ध चरित्र की निर्मल चेष्टाजगा दो ।
निष्फल कर दे हर कुत्सित दृष्टि को
ऐसा आत्म नियंत्रण भर दो ,
हर पुरुष को राम ,हर नारी को सीता कर दो
पैदा ना हो कोई रावन फिर से
इस कलियुग को सतयुग कर दो ।
हर नारी में शुद्ध चरित्र की निर्मल चेष्टाजगा दो ।
निष्फल कर दे हर कुत्सित दृष्टि को
ऐसा आत्म नियंत्रण भर दो ,
हर पुरुष को राम ,हर नारी को सीता कर दो
पैदा ना हो कोई रावन फिर से
इस कलियुग को सतयुग कर दो ।
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