उत्सर्ग
ये ज़िन्दगी कुछ मोम सी
घट रही दुःख ताप से पिघल -पिघल
है आरम्भ से अंत तक वेदना का सिलसिला
ये ख़याल बस एक त्याग का जल रही तूफान में संभल -संभल ।
फूँक से बुझा रहा था नादान बाल वो
था कयास क्या उसे
दृढ़ हो रही थी स्व से निकल -निकल ।
हुआ अँधेरा जब जंहा इसे वंहा सजा दिया
जलती रही ,जलती रही रौशनी में बुझा दिया लेके पीर दिल में यूँही
रही अंत तक विकल -विकल।
घट रही दुःख ताप से पिघल -पिघल
है आरम्भ से अंत तक वेदना का सिलसिला
ये ख़याल बस एक त्याग का जल रही तूफान में संभल -संभल ।
फूँक से बुझा रहा था नादान बाल वो
था कयास क्या उसे
दृढ़ हो रही थी स्व से निकल -निकल ।
हुआ अँधेरा जब जंहा इसे वंहा सजा दिया
जलती रही ,जलती रही रौशनी में बुझा दिया लेके पीर दिल में यूँही
रही अंत तक विकल -विकल।
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