लक्ष्य की प्राप्ति में साधन की पवित्रता का होना बहुत अहम है




हर इंसान की ज़िन्दगी में कुछ तम्मनायें ,कुछ ख़्वाहिशें होती  हैं  जिनको पूरा करने के लिए वह हर संभव
प्रयास करता है । कुछ लोग अपने लक्ष्य को पाने के लिए उचित व न्यायोचित मार्ग अपनाते हैं जबकि कुछ इसके लिए अपने धर्म ,मर्यादा व मानवीय मूल्यों को दाव पर लगा देते हैं । ऐसे लोगों पर मुझे तरस भी आता है और क्रोध भी। माना के  प्रसिद्धि पाना हर  इंसान का सपना होता है परन्तु इसके लिए अनुचित साधन अपनाना  एकदम ग़लत है । एक ग़रीब व्यक्ति यदि ख़ुद को अमीर बनाने के लिए चोरी  ,हत्या आदि घिनौने कृत्य   करता है तो वह अपना अगला जन्म  भी निष्चित रूप से ख़राब  करने जा रहा  है । इसके विपरीत  यदि वह परिश्रम कर ,ईमानदारी से थोड़ा -थोड़ा अर्जित करके जिंदगी में आगे बढ़ता है तो वह उस अमीर से कई गुना श्रेष्ठ है जो चोरी ,हिंसा आदि का सहारा लेकर एक उच्च पद पर आसीन  है । अर्थात लक्ष्य की प्राप्ति में साधन की पवित्रता  का होना  बहुत अहम  है ।  ऐसे अपराधी तत्त्व जो अपनी ख़ुशियों के लिए किसी  का  भी  अहित करने के लिए तैयार  हो जाते हैं  बहुत ही निकृष्ट  कोटि  के प्राणी होते हैं । यदि इंसान होकर भी हमारे अंदर प्रेम,क्षमा ,दया  जैसे  सदगुण  नहीं  हैं तो हमें  इंसान कहलाने का कोई हक़ नहीं है । जब हम अंदर से अच्छे होते हैं तो हम भय मुक्त और प्रसन्न रहते हैं ,चाहे फिर हमारे  कितने ही विरोधी क्यों  न हों लेकिन हम जब अंदर से सही नहीं होते तो एक बड़े समूह का साथ भी हमें सुकून नहीं देता ।

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