एक आलोचक जब किसी की आलोचना करने पर उतारू होता
है तो इतनी तल्लीनता से करता है कि गैस पर रखा दूध कब मावे में तब्दील हो जाता है, उसे खबर ही नहीं लगती ।
है तो इतनी तल्लीनता से करता है कि गैस पर रखा दूध कब मावे में तब्दील हो जाता है, उसे खबर ही नहीं लगती ।
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