स्कूलों में सूर्य पूजा व योग की अनिवार्यता के ख़िलाफ़ उठने वाली आवाजों का कोई तार्किक कारण ही समझ नहीं आ रहा है। कैसी अज़ीब बात है कि लोग भगवान सूर्य देव को भी किसी धर्म विशेष से जोड़कर देख रहें हैं । भगवान सूर्य देव किसी धर्म या व्यक्ति विशेष के संरक्षक नहीं हैं ,वो सभी को समान रौशनी देते हैं । क्या कभी उन्होंने हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख,ईसाई या अन्य किसी धर्म को कम या ज्यादा प्रकाश दिया है ? ऐसे ही योग ,यह तो एक प्राकृतिक व्यायाम है । शरीर को स्वस्थ रखने का एक अध्यात्मिक उपाय है इससे किसी का कुछ बुरा नहीं वरन अच्छा ही होगा । कम से कम सूर्य, चन्द्रमा ,तारों और आकाश को तो धर्म की सीमा से मुक्त रखें देशवासियों !जब किसी भी धर्म के व्यक्ति के साथ दुर्घटना होती है और खून की जरूरत होती है तब क्या ब्लड बैंक से ब्लड लेते वक्त बोतल के लेबल पर धर्म विशेष की जाँच करके ही खून लिया जाता है ?।नहीं ! तब तो हमारा उद्देश्य व्यक्ति की जिंदगी को बचाना होता है ,उस समय हम किसी धर्म विशेष के नहीं होते वरन मात्र मानव होते हैं। ये मानवीयता वाला दृष्टिकोण ही हमे सदैव रखना चाहिए ।
मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो
मृत्यु के भय से अगर सही को सही और गलत को गलत ना कह सको,तो सन्देह करो अपने मनुष्य होने पर . शक्तिशाली हो कर अगर किसी निर्बल की शक्ति न बन सको,तो संदेह करो अपने शक्तिशाली होने पर. संपन्न हो कर अगर मदद ना कर सको किसी निर्धन की,तो सन्देह करो अपनी सम्पन्नता पर . पुरुष हो कर अगर किसी नारी के सम्मान की रक्षा न कर सको,तो संदेह करो अपने पौरुष पर। धार्मिक हो कर भी अगर धर्म की रक्षा न कर सको, तो धिक्कार तुम्हारे धार्मिक होने पर. मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो इस धरा पर, सिर्फ देह मनुष्य की होना ही मनुष्यता नहीं, समझो इस ध्येय को तो इंसान हो तुम ना समझो तो चारा चर रहो कही। -
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
allowed