फितरत
ख्वाहिशें ,सपने ,ध्येय ,उम्मीदें सब दिल मे डेरा जमाए बैठे हैं
खत्म करूँ इनको तो दिल खाली है
पाल के रखूँ तो सेहत मे कंगाली है
इनके वजूद को भी रख लूँ
ये सेहत भी सँभाल लूँ
हम ऐसे ही किसी मशविरे की आस लगाए बैठे हैं
मेरी आदतों पर मत जाना ए दोस्त
कभी खुशमिजाज़ भी दिखते हैं
तो कभी मुँह भी फुलाए बैठे हैं
चुगलियाँ ना करना मेरे मनमौजी मिजाज़ की
जो दुश्मन थे कभी हमारे ,आज दिल भी लगाए बैठे हैं
मेरी एक हरकत पर वो तूफान मचा देते हैं
सुन लो गौर से ये भी , दिल मे बबँडर हम भी
छुपाए बैठे हैं .
-अंशु चौहान
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