'बालिका'




माँ  की  अल्मारी  मे  मेरे बचपन  का  कोई खिलौना  नही  मिलता

गाँव  की  उन  गलियों  मे  अब  मेरा  कोई  ज़िक्र नही मिलता

अब समझी  मै  बालिका  होने  का  मतलब

ये  वो  है  जिसे  अपने  ही  घर  मे  अपना  हक नही  मिलता

बेटे  की  ख्वाहिशें  जहाँ  सर्वोपरी  होती  हैं ,

बेटी  की  तमन्नाओं  को  कोई  दाम  नही मिलता.

बड़ा  अजीब  सा  आलम  है  कि  कन्या  पूजन 

भी  होता  है  मगर ,देवी  सा  उनको  सम्मान 

नही  मिलता  .

चरण -स्पर्श  भी  होते  हैं  नवरात्रों  मे  लेकिन

ताउम्र  मन मे उनके  प्रति  वो  सुविचार  नही  मिलता .

समझ  चुकी  हूँ  बालिका  होने  की  सज़ा  क्या  है ,

ये  वो तितली  है  जो  उड़ना  तो  चाहती  है  पर 
साबुत  अपना  कोई  पर  नही  मिलता .

-अंशु  चौहान

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