'परस्पर निर्भरता '



दुनिया का कोई भी इंसान कभी भी पूरी  तरह आत्म निर्भर नही हो सकता.यदि कोई ऐसा सोचता है तो  वह भ्रम  मे है.बचपन से लेकर बड़े होने तक किसी न किसी पर निर्भरता बनी ही रहती है.जब वह छोटा होता  हैँ तो माँ पर ,बड़ा  होता हैँ तो बाप  और दोस्तो पर.कोई व्यवसाय या जॉब  करता है तो अपने सहकर्मियो पर. यहाँ तक की अपनी कला ,प्रतिभा ,योग्यता के खरेपन(गुणबत्ता)की जांच के लिए भी अन्य के निर्णय पर निर्भर करता है. कितना अजीब है ना कि तुम किसी चीज मे योग्य हो इसका निर्धारण भी दूसरे करते  हैँ .तुम्हारा खुद का कुछ भी नही है.तुम्हारे मानने से नही बल्कि दूसरो की स्वीकृति से तुम स्थापित होते हो.दूसरों की अस्वीकृति तुम्हे असफल और स्वीकृति सफल बनाती है.दूसरो की रूचि ,उनका मत,उनका चुनाव ही तुम्हारी पहचान उजागर करता है. पूरी दुनिया ही परस्पर निर्भरता से चल रही है.चाहे कोई भी व्यवसाय या उद्योग सेवा हो.इसलिए आपकी पहचान ,शख्शियत आपकी नही बल्कि दूसरो के द्ववारा दी गयी है.किसी भी तरह का अहंम पालना .

-अन्शु चौहान

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