"हौसला रखें "
आज हम सब परेशान हैं,चिंतित हैं,विचलित हैं वजह सिर्फ एक है - 'महामारी '.इसने मृत्यु का एक खौफ हर व्यक्ति के मन में ऐसा भर दिया है कि ज़िन्दगी असहज लगने लगी है.ना मन स्वस्थ है न तन.दिन -रात एक अज़ीब सा भय है मन मे.एक अनिश्चितता की स्थिति में आशंकित से हम सभी जिए तो जा रहे हैं पर ना खुद की सांसों पे भरोसा है ना औरों की सांसों पे.कल्पना से परे की किसी दुनिया को यथार्थ में महसूस कर रहें हैं और खुद को इसमे अकेला,असहाय और भटका हुआ सा पा रहें हैं.तमाम समझाने की कोशिश करते हैं मन को, मगर वास्त्विकता ठुकरा देती है हर मानसिक तैयारी को .मन परेशान हो उठता है,मनोबल हार मानने लगता हैँ .तब वही(ईश्वर )संभालता है,उसका ध्यान ही भर देता है मन को एक सकारात्मकता से, जिसका अस्तित्व उतना ही वासत्विक और दृढ़ हो सकता है जितना की ईश्वर में हमारी आस्था और उसके चमत्कारों में विश्वास.सच्चाई तो ये है कि ईश्वर में आस्था के बिना मेरे लिए तो जीवन की कल्पना ही असंभव है.कभी-कभी सोचती हूँ कि नास्तिकता के साथ जीना भी कितना दूभर होता होगा .मुसीबत की स्थिति में जब किसी ऐसी परम सत्ता के सहारे की उम्मीद ना हो जो हमें संभाल सके,जो हमें आत्म बल प्रदान कर सके.जिसकी प्रार्थना से हर बाधा दूर होने का विश्वास ना मिल सके.
सच ही है .ज़िन्दगी की हर उपलब्धि व्यर्थ है जब तक मन ,मस्तिष्क स्वस्थ ना हों .सब व्यर्थ है जब तक परिस्थितियां अनुकूल ना हों और सब तभी संभव है जब ईश्वर व प्रकृति साथ हो.इसलिए कभी भी ईश्वर को व प्रकृति को नाराज मत करो. आज जो समय है इसमें सिर्फ और सिर्फ ईश्वर ही हमारी मदद कर सकता है.ये अलग बात है कि वो ये काम प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से करता है .इसलिए पूरा विश्वास उस पर रखिए,अपने कर्म करते रहिए ( सारे ज़रूरी नियम अपनाकर).घबराइये मत! विश्वास रखिए ईश्वर पर और स्वं के मनोबल पर.जो तुम्हारे वश में नहीं है उसे ,उस परम सत्ता पर छोड़ कर निर्भीक हो जाइए.वो संभाल लेगा सब कुछ ....इसलिए प्रेम से रहिए,आपसी द्वेष भाव त्याग दीज़िए, मन पर व्यर्थ का बोझ मत डालिए और ज़िन्दगी जितनी भी उसने दी है , उसकी अहमियत समझिए.हमारा ये स्वरूप,हमारी ये पहचान सिर्फ इस जन्म में है.फिर क्या रूप हो, कहाँ हों कुछ पता नहीं ...इसलिए नफरतों और नकारात्मकता को अलविदा कह दीजिए.
-अंशु चौहान

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