"आयुर्वेद बनाम एलोपैथी "
किसी भी व्यक्ति में अगर कोई योग्यता है तो उसे बिना संकोच स्वीकार करना चाहिए ,उसके गुणों को अपनाना चाहिए फिर चाहे वो आपका शत्रु या प्रतिस्पर्धी ही क्यों न हो.कोई दो शक्तिशाली,विद्वान पक्ष आपस में अगर द्वेष - भाव छोड़ कर,विवाद छोड़कर अपनी -अपनी शक्ति को ,विद्वता को सही दिशा देकर देश के ,मानव जाति के विकास और उसकी उन्नति में लगाएँ तो उनकी योग्यता सार्थक है वरना दोनों ही शून्य हैं.विषय कोई भी हो .विद्वान सफल व योग्य व्यक्ति वह है जो खुद को श्रेष्ठ घोषित करने की ज़ददोजहद में न पड़ कर कुशलता पूर्वक अपना कर्म करता रहे व समय आते ही उसकी श्रेष्ठता स्वं प्रमाणित हो जाए .
प्रसंग चाहे आयुर्वेद को श्रेष्ठ प्रामाणित करने का हो या एलोपैथी को .
मेरी दृष्टि में दोनो ही चिकित्सा पद्धति श्रेष्ठ हैं.
आयुर्वेद जहाँ प्राचीन काल से चली अा रही एक सक्षम ,सार्थक पद्धति है वहीं आधुनिक समय में एलोपैथी चिकित्सा पद्धति की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता.योगा,आयुर्वेद,प्राकृतिक चिकित्सा ये सब आज भी उतनी ही महत्ता रखते हैं जितनी की पहले.प्राचीन काल में हर गंभीर बीमारी का इलाज आयुर्वेदिक तरीके से ही होता था लेकिन आज परस्थितियाँ अलग हैं,लोगों का रहन -सहन ,खान-पान अलग है इसलिए चिकित्सा पद्धति में आधुनिकता ज़रूरी है.अतः आधुनिक चिकित्सा की महत्ता भी उतनी ही है. दोंनो में से किसी का आँकलन कम नहीं होना चाहिए.

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