'बढ़ती उम्र का दर्द'


इंसान की असन्तोषी वृत्ति का कुछ नहीं किया जा सकता। बचपन में बड़े होने की इच्छा रखता है और जब बड़ा हो 

जाता है तो बड़ा कहलाने से परहेज़ करता है। अंकल-आंटी जैसे  शब्द तो उसे गाली से लगने लगते हैं।  

इन शब्दों ने तो इतनी बड़ी समस्या पैदा कर दी है कि कितना भी समझदार व्यक्ति इन्हे सुनकर भड़क उठता है। 

और बोलने वाले भी कई बार इस बात का ध्यान नहीं रखते की इसे कहाँ प्रयोग करना है.हर व्यक्ति बिना कुछ सोचे 

समझे इन्हे किसी भी व्यक्ति के लिए प्रयोग में ले लेता है।वह ये दिमाग भी लगाने की कोशिश नहीं करता की ये 

शब्द अमुक व्यक्ति के लिए सही हैं भी या नहीं.यहाँ बड़े बच्चों द्वारा अपने दोस्त की मम्मी को भी आंटीऔर उनकी  

सास को भी आंटी कहा जाता है.अब उम्र का इतना बड़ा अंतर और फिर भी सम्बोधन एक जैसा,निश्चित ही ये सोचने का विषय तो है.

ये दादियों  के लिए तो गर्व की बात  हो जाती  है मगर बेचारी मम्मियों के लिए थोड़ा शर्मिन्दगी  पैदा 

करने वाली  होती है। इस तरह से अंग्रेजी शब्दों की उपस्थिति भी आग में घी का काम करती है। 
 

 इधर अपनी उम्र छोटी जताने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति भी,चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए मगर वह 

अपनी उम्र को 7-8 साल कम ही बताता है।अक्सर 40 के बाद ये समस्या शुरू होती है,जब व्यक्ति जवानी को 

विदा करके अधेड़ावस्था की ओर अपना पहला कदम रखता है.एक तो दिल में युवावस्था को अलविदा कहने का 

ग़म होता है और साथ ही अगल-बगल  के बड़े-बड़े बच्चे का,अंकल-आंटी कहकर सम्बोधित करने का कहर। 

इस मानसिक प्रताड़ना से जूझते हुए वह कभी-कभी तो अपनी उम्र इतनी कम बता देते हैं कि  

उनकी संतान भी उम्र का इतना कम अंतर सुनकर डिप्रेशन में आ जाती  हैं। 

तो भाई साहब और बहनजियों इतना लोड लेने की जरूरत नहीं है.हर उम्र  कीअपनी विशेषताएं होती हैं।

अपने आप में हर उम्र अपना अलग  महत्त्व रखती है.तो स्वीकार कीजिए,ज़िंदगी का नया अनुभव लीजिए। 

आने वाले बुढ़ापे के लिए भी उत्साहित रहिए।

बुढ़ापे को बाल रंगने में,सौंदर्य प्रसाधन उपभोग करने में,कानाफ़ूसी में 

और बच्चों की आलोचना और उनसे अपेक्षा में न गवाएं बल्कि पूरी तरह ईश्वर से जुड़कर अपने मनुष्य जन्म को 

सार्थक बनाएं। फिर न ही मन अशांत रहेगा ,न ही पारिवारिक क्लेश होगा। हिन्दू धर्म में इसीलिए तो उम्र के 

अनुसार आश्रम  व्यवस्था की गई है। अपनी उम्र के अनुसार अपने कर्त्तव्य व् धर्म को समझें। इनका पालन न करने 

के कारण आज सभी परिवारों में गृह क्लेश देखा जा सकता है क्योंकि बच्चों को उनके कर्त्तव्य और संस्कार की 

सीख देने वाले तो बहुत हैं मगर बड़ों को (एक्ट टू बी ऐज)की सीख देने वाला कोई नहीं है क्योंकि इसमें बच्चों को 

असंस्कारी या असभ्य होने की दलील दे दी जाएगी। हर वक्त बच्चे असंस्कारी हो और बुजुर्ग या बड़े सभ्य हों ये भी 

ज़रूरी नहीं है.अगर ऐसा होता तो बच्चों को उल्टा लटकाकर पीटने वाले माँ-बाप,पैदा होते ही संतान को कचरे के 

डब्बे  में फेंक देने वाले माँ-बाप और दहेज़ के लिए बहु को जला देने वाले सास-ससुर व अन्य बड़े,सड़क पर चलती 

(बेटी की उम्र जितनी) बालिकाओं पर कुदृष्टि  डालने वाले बुजुर्ग़ भी गलत नहीं माने जाते.


पूजा-पाठ करने की उम्र में मन को सांसारिक आकर्षण से दूर रखना चाहिए वर्ना दोनों ही अशांत रहेंगे।

मानती हूं यहाँ कलयुग के प्रभाव से ग्रसित हर व्यक्ति बुजुर्गों को भी जवानों की तरह रहने की व उन्हें सांसारिकता 

में रमे रहने की सीख देगा मगर ये तो स्वचिंतन का विषय है कि उसके लिए कौन सा मार्ग वृद्धावस्था में उपयुक्त है.

सांसारिकता से समय पूर्व  विरक्त होने वाला,अपने गृहस्थ जीवन के कर्तव्य नहीं निभा पाएगा औरआध्यात्मिकता से 

मुँह फेरे हुए बुजुर्ग, जीवन के अंतिम लक्ष्य से वंचित रह जाएंगे इसलिए बुजुर्ग हमेशा खुद को उम्र में छोटा व जवान 

दिखाए जाने की ज़द्दोज़हद से बचें।बढ़ती उम्र को परिपक़्वता और ख़ुशी के साथ अपनाए,क्योकि छोटा बने रहने में 

नहीं बड़े बने रहने में ही महानता है.वैसे भी जब आप बड़े हो गए हैं तो अपने से छोटों के साथ बड़प्पन दिखाएँ।

अपने अनुभवों से उनका सही मार्गदर्शन करें।उन्हें एप्रिशिएट करें,न की उनकी कमियाँ निकल कर अपने प्रति 

उनके दिल में द्वेष भाव पैदा करें. 

उन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने दें मगर सही और ग़लत समझने में उनकी नैतिक मदद भी करें. 

इस तरह आप दोनों ही पीढ़ीअपनी-अपनी ज़िंदगी के उद्देश्य के प्रति सजग रहेंगे और परस्पर सामंजस्य बिठा पाएँगे। 
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