'असंतोष '
जब भी आपको अपने पास उपलब्ध किसी भी चीज़ से असंतोष उत्पन्न हो तो ये सोचकर देखें कि इससे बुरी भी तो हो सकती थी मगर आप हरवक्त उपलब्ध चीज़ से ज़्यादा अच्छी की कल्पना करते हैं और असंतोष की गिरफ्त् में आ जाते हैं.याद रहे आपको जो भी अर्जित होता है आपके ही संचित कर्मों से अर्जित होता है.अपने ही कर्मों से उपलब्ध व अर्जित किसी चीज़ के प्रति नकारात्मक नज़रिया आपके खुद के कर्मों के प्रति अस्वीकृति है.इसलिए अपने कर्मों को उत्कृष्ट बनाने की कोशिश करिये न की उपलब्ध चीजों के प्रति दुख,शोक और अस्वीकृति.हर व्यक्ति,हर वस्तु व व्यक्ति में तो perfection चाहता है परंतु उनका अधिकारी बनने हेतु अपने कर्मों में नहीं .तो अब अपने कर्मों की तरफ ध्यान दीजिए उपलब्ध चीजों की कमियों में नहीं.आप कमिया ही खोजते रहे तो फिर से अपने कर्म खराब करते जाएंगे क्योकि असंतोष से अपराध की उत्पत्ति होती है और अपराधी व्यक्ति तो ख़राब कर्म ही करेगा और ख़राब कर्म के रहते जीवन में कुछ अच्छा घटित होने की कल्पना करना मूर्खता है .

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