कविता (यूँही दिल को जलाने से क्या फ़ायदा..)
यूँही दिल को जलाने से क्या फ़ायदा
उन पे तोहमत लगाने से क्या फ़ायदा
अश्क ही ना हों आँखों से गिरते अगर
सूखी आँखों से रोने से क्या फ़ायदा
ग़म ही ज़ाहिऱ हो सांसों की रफ़्तार से
चेहरे की हरक़त छुपाने से क्या फ़ायदा
दिलज़लों की ना हालत सुधरती कभी
वैद हक़ीम को दिखाने से क्या फ़ायदा
न सलीका हो चाहत निभाने का तो
मुक़द्दर की बातों पे रोने से क्या फ़ायदा।
रंज़ -ओ -ग़म की ज़ुबाने कई और भी
खुद को गुमसुम दिखाने से क्या फ़ायदा
-अंशु चौहान

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