आसक्ति


 


इंसान की दुर्गति का सबसे बड़ा कारण हैं किसी भी व्यक्ति या वस्तु में आसक्ति।आसक्ति से ही अन्य तमाम विकार 

पैदा होते हैं। गीता में कहा गया  है कि कोई भी कर्म हमे निरासक्त भाव से ही  करना चाहिए। किसी भी चीज़ में 

आसक्ति का मतलब है कि हम उस वस्तु,व्यक्ति या कर्म-फल के प्रति इतने मोह ग्रसित हो जाते हैं कि उसके बिना 

हम खुद के जीवन के मायने खोने लगते हैं। हम किसी भी क़ीमत पर उसे अर्जित करना चाहते हैं और नहीं मिलने 

पर अवसाद ग्रसित होकर अपराध की राह पर चलने लगते हैं। 


आसक्ति इसलिए अधिक घातक है क्योंकि वो इंसान के विवेक को नष्ट कर देती है,उसकी सहनशक्ति ख़त्म कर 

देती है। उसे मानसिक रूप से पंगु बना देती है। 

किसी के प्रति आपकी आसक्ति,आपकी भौतिक व नैतिक दोनों ही प्रकार की उन्नति अवरुद्ध कर देती है। 

आसक्ति कर्म बंधन में फँसा देती है। अनेक इच्छाएँ ,लोभ व दुर्वृत्तियाँ पैदा कर देती है.


अब यदि आपने अपनी विवेक शून्यता से आसक्ति पैदा कर ही ली है तो इसे दूर करने के लिए आपको उन विशेष 

चीज़ों के प्रति अपना नज़रिया बदलना पड़ेगा। नज़रिया बदलेगा जब ईश्वर की कृपा दृष्टि आप पर होगी और ईश्वर 

की कृपा दृष्टि आप पर हो ,उसके लिए आपको प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पित होना पड़ेगा।  

जिस दिन आप प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पित हो गए उस दिन से ही आपको असीम आनंद की प्राप्ति होने लगेगी। 

अन्य सांसारिक वस्तु या व्यक्ति के प्रति आपका मोह ख़त्म हो जाएगा और आप शांत हो जाएंगे भीतर से।आपकी  

वही आसक्ति अब  प्रभु के प्रति हो जाएगीऔर वो आसक्ति आपको कर्म बंधन में बांधेगी नहीं बल्कि मुक्त कर देगी 

हर बंधन से। सोचिये फिर आप जिसके प्रति आसक्त होंगे वो पूरी सृष्टि की सबसे  शक्तिशाली और आकर्षक 

दिव्य शक्ति होगी आपके साथ,ईश्वर के रूप में। आप उसके सानिध्य में सुरक्षित ,प्रसन्न और पूर्णतया संतुष्ट रहेंगे। 


तो व्यर्थ की फफूँद न पालें अपने जीवन में। मोह या आसक्ति रखनी ही है तो प्रभु के प्रति रख्ने क्योंकि बाकी सब 

तो खुद ही अपना भविष्य नहीं जानते  जिनके प्रति आसक्त होकर आप इतने दयालु और प्यारे ईश्वर को भुला 

बैठे हैं।

आसक्ति हटाने के लिए सबसे ज़रूरी है कि आप ये देखें  कि जिसमें आपकी आसक्ति है वो किस वजह से है। 

अगर किसी व्यक्ति की  सुंदरता की वजह से है तो शरीर की रुग्णता और क्षणभंगुरता के बारें में सोचें। अगर 

किसी कीमती वस्तु के बारे में है तो उसकी क्षणभंगुरता और निर्जीवता के बारे में सोचें। किसी का भी आकर्षण 

किसी व्यक्ति या वस्तु में,सुंदरता की वजह से होता है ,या अपनी  ही किन्ही व्यक्तिगत स्वार्थी इच्छाओं की वजह से 

होता है। जब हमारा विवेक जागृत हो जाता है और बुद्धि परिष्कृत और आध्यात्मिक हो जाती है तो हम मोह ग्रसित 

नहीं होते और न ही  किसी के प्रति आसक्त होते हैं। 




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