'मौन'
कहते हैं कि मौन में बड़ी ताकत होती है। प्रायः देखा गया है कि साधु-संत भी मौन रहना ही पसंद करते हैं। ये भी
कहा जाता है कि असंतुष्ट और अज्ञानी व्यक्ति को ज़्यादा बोलने की आदत होती है क्योंकि एक संतुष्ट और ज्ञानी
व्यक्ति के पास अधिकतर प्रश्नों के उत्तर होते हैं और हर चीज़ से संतुष्ट रहने के कारण उसे बोलने की ज़रूरत नहीं
पड़ती है।वह सीमित वार्तालाप ही करता है।
ये भी कहा जाता है कि मौन रहने के इतने फायदे हैं कि इसको अपनाकर तमाम विवादों से बचा जा सकता है
लेकिन ये बात थोड़ी अज़ीब लग सकती है सामान्य व्यक्तियों के सन्दर्भ में,क्योंकि अगर किसी व्यक्ति का किसी से
झगड़ा हो जाये तो क्या उस स्थिति में किसी एक पक्ष के मौन धारण कर लेने पर झगड़ा शांत हो जाएगा या और
बढ़ेगा। क्योंकि क्रोध में पागल व्यक्ति की बात का उत्तर न दिया जाये तो वो इतना आक्रामक हो जाता है कि वो
आपका सिर भी फोड़ सकता है, आपकी मौनावस्था से क्षुब्ध होकर।तो उस स्थिति में आपका मौन आपकी ज़िंदगी
को ही सदैव के लिए मौन कर सकता है।
ठीक इसी तरह अगर कहीं अपराध या अन्याय हो रहा है और आप ये सोच कर मौन धारण
किये हुए हैं कि शांत रहना चाहिए यही श्रेष्ठ गुण है तो ये विचार भी धर्म विरुद्ध है।
ये विचार किसी निर्दोष के प्राण भी खतरे में डाल सकता है क्योंकि किसी भी अन्याय को होते हुए
देखना ,उसे सहन करना भी उतना ही बड़ा अपराध है जितना कि किसी अपराध को करना।
तो मौन और सहनशीलता भी समय ,परस्थिति के अनुसार देख समझ कर ही ग्रहण किये जाने चाहिए।
हाँ महात्मा ,साधु-संत हम सामान्य लोगों से अलग होते हैं,अलग आत्मिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ रखते हैं तो
उनकी प्रतिक्रिया,आचरण व्यव्हार ईश्वर संकेतों द्वारा संचालित होने के कारण हम से अलग हो सकता है व अलग
परिणाम भी दे सकता है।
तो कुछ बातें महान और साधु लोगों के सन्दर्भ में ही सही कहलाती हैं। हर कहावत और हर जीवन मंत्र का प्रयोग
सोच समझ कर ही करें। हर चीज़ की प्रासंगिकता और परस्थितिनुकूलता की जाँच करके ही करें ।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
allowed