अंतिम सफ़र


 

मृत्यु जीवन का अटल सत्य है। ये एक ऐसा विषय है जिस पर ज़िन्दा रहते कोई भी बात करना पसंद नहीं करता है 

और मृत्यु के बाद कोई भी बात करने लायक रहता नहीं है।मृत्यु के सम्बन्ध में  सबसे बड़ी समस्या  ये है कि इसका 

कोई निश्चित समय नहीं है। ये कभी भी,कहीं भी आ सकती है।अन्य  सब सामानों की तरह इंसान की  एक्सपायरी 

डेट नहीं होती है.इसी अनिश्चितता की वजह से ही इंसान हर वक़्त एक अनजाने भय से ग्रसित रहता है। 

 ये भय हर व्यक्ति  में नहीं होता है लेकिन कुछ जो ज़िंदगी से अत्यधिक मोह ग्रसित रहते हैं और जिन्होंने भविष्य के 

लिए असीमित योजनाएँ व् तृष्णाएँ पाली होती हैं उनके लिए निश्चित ही आक्रांत करने वाली होती है। 

वो लोग जो ईश्वर से ज़्यादा नहीं जुड़े हैं उनके लिए ये ज़्यादा ख़तरनाक़ हो सकती है।

जो लोग ईश्वर से बहुत ज़्यादा जुड़े हैं,जो प्रभु को ही सच्चा रिश्तेदार मानते हैं उनके लिए तो वो दुनिया भीअपने घर 

जैसी होने वाली है. इसलिए कुछ के लिए ये जश्न है अपने प्रीतम से मिलने का और कुछ के लिए भयंकर दुःख। 


ये सच है कि माया से बचना हम सांसारिक मनुष्यों के लिए काफ़ी मुश्किल काम है और माया का प्रभाव इतना 

प्रखर होता है कि बिना उच्च आध्यात्मिक ज्ञान और प्रयत्न के इससे बच पाना एक सामान्य इंसान के लिए लगभग 

असंभव सा है। हर व्यक्ति अपने सगे-सम्बन्धियों,भौतिक वस्तुओं से इतनी गहराई से  जुड़ा है कि उसे इन सबके 

अलावा सब काल्पनिक और मिथ्या लगता है जबकि वास्तविकता में ये सब ही मिथ्या है और जिसे वो काल्पनिक 

समझता है वही यथार्थ है।  

जिस दिन हम इस  यथार्थ को जान लेंगे इस भौतिक जगत के प्राणियों से व वस्तुओं से मोह छोड़ देंगे।हम जुड़ 

जाएंगे फिर अपने उस असली रिश्तेदार से जो अंत तक व अंत के बाद तक भी हमारा साथ देने वाला है। 

सांसारिक रिश्तेदार तो यहीं तक के साथी हैं और यहाँ भी उनकी कोई  कोई गारण्टी नहीं है।जबकि प्रभु हमारे अंत 

के बाद भी हमारे साथ होंगे और वो भी गारण्टी के साथ,अगर उनसे प्रीत कर ली तो। 


इतना कुछ होते हुए भी हम नश्वरता से ज़्यादा मोह दिखाते हैं और स्थाई और परम सुखद को अपना नहीं 

मानते,उससे प्रीत नहीं दिखाते हैं।

अगर आप असली सुख चाहते हैं तो उस परमानन्द से जुड़ जाइये।फिर माया आपको ज़्यादा प्रभावित नहीं करेगी। 

सांसारिकता आपको ज़्यादा रोचक नहीं लगेगी। सांसारिक चीज़ें आपको ज़्यादा प्रभावित नहीं करेंगी। इसके साथ 

ही आपका स्तर भक्ति में जैसे -जैसे उच्च होता जाएगा आप सांसारिकता से मानसिक रूप से धीरे-धीरे विरक्त भी 

हो जाएंगे। फिर वो स्थिति होगी कि सांसारिक दायित्व निभाते हुए भी आप सांसारिकता से अप्रभावी रहेंगे। बस यही 

स्थिति होनी चाहिए हर दुःख से मुक्ति के लिए। 


मृत्यु के प्रति भय का कारण  होता है हमारी विवेकशून्यता ,हमारा अज्ञान। जब हम जानते हैं कि आत्मा अमर है तो 

शोक क्यों ?शरीर के स्तर पर जीने की वजह से ही हम आत्मा की महत्ता ,उसका स्वरूप नहीं जान पाते। नश्वर 

शरीर में ज़्यादा आसक्ति ही हमारे दुःख का कारण है। आत्मा शाश्वत है इसलिए वह सिर्फ शरीर परिवर्तन करती है। 

इसलिए दुःख ,शोक,भय से ऊपर उठने के लिए प्रभु की शरण लेनी चाहिए. प्रभु की शरण में जाने से आपका भय 

ख़त्म हो जाता है.


गीता में स्पष्ट लिखा है कि मृत्यु पर शोक नहीं करना चाहिए। जानती हूँ कि मोह-माया में अंध हम सांसारिक मनुष्यों 

के लिए  ये फ़ालतू उपदेश हैं और अरुचिकर व अस्वीकार्य  बातें हैं लेकिन भगवत आश्रित व्यक्ति ये सब समझता है।  

मृत्यु का समय किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। कोई भी भगवत प्रेमी व्यक्ति एक मृत्यु सैया पर 

लेटे व्यक्ति कीअंतिम  गति सुधार सकता है। वह मरणासन्न स्थिति वाले व्यक्ति के कान में कृष्ण और राधा नाम का 

कुछ बार उच्चारण कर दे तो वह व्यक्ति मुक्त हो सकता है.अगर कोई व्यक्ति अंतिम समय में सांसारिक वस्तुओं 

और प्राणियों से मोह हटाकर प्रभु चिंतन कर ले तो स्वं के द्वारा भी उसकी मुक्ति हो सकती है वरना वही ८४ के 

चक्कर,पशु या भूत-प्रेत आदि योनियाँ। 


ख़ैर बाकी सब की इच्छाओं,धारणाओं के बारें में मै कुछ नहीं कह सकती लेकिन मैं जब भी इस दुनिया से विदा लूँ 

तो मेरी ये इच्छा रहेगी कि मेरी मृत्यु  के समय कोई भी व्यक्ति चीखता-चिल्लाता,रोता-पीटता न आये।

मेरे पास उपस्थित हर व्यक्ति के मुख से सिर्फ़ राधे-कृष्णा का उच्चारण हो।ईश्वर से सम्बंधित बातें हों।

सीता-राम,राधे-कृष्णा का ही ज़िक्र हो।

मेरे कानों में सिर्फ़ प्रभु के नाम ही सुनाई दें। किसी का करुण रुदन नहीं।

अंतिम समय मेरी दृष्टि के सामने प्रभु कृष्ण और श्री राधा जी की किसी तस्वीर की व्यवस्था कर दी जाये,अगर संभव 

हो तो।उस स्थल पर कोई अनावश्यक,निरर्थक चर्चा न हो।

मेरी अच्छाई या बुराई का नहीं, बस प्रभु के नामों का स्वर ही मेरे कानों में पड़े।


मुझे इस बात में कोई रूचि नहीं होगी कि मेरी मृत्यु पर कितनी भीड़ एकत्र हुई, कितने उच्च पद के लोग आएं 

लेकिन इसमें ज़रूर रहेगी कि जितने भी लोग शामिल हों पवित्र मन के,ईश्वर और मानवता प्रेमी हों। 

आख़िर सफर तो सफ़र है ,पसंद न हो तो मज़बूरी और पसंद हो तो रूचि।

जब ईश्वर से प्रीत हो तो सफ़र सुखद और प्रीत न हो तो दुःख ,मज़बूरी और अफ़सोस। इसलिए प्रभु से प्रीत 

रखे.बाकी सब मिथ्या है अस्थायी है।  



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो

भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें'