कलंकित न हो संस्कृति


 

हमारी भारतीय संस्कृति का अलग ही 

गौरव है,अपनी अलग विशेषता है। 

विदेशी भी भारतीय संस्कृति का सम्मान 

करते हैं।यहाँ की संस्कृति की कुछ ख़ास 

विशेषताएं हैं जिसकी वजह से सभी 

लोग इसकी ओर आकर्षित होते हैं। 

इस संस्कृति का मूल स्वरूप खोना नहीं 

चाहिए। किसी अन्य संस्कृति से प्रभावित 

होकर हमें अपनी इस गरिमामय 

संस्कृति को विसराना नहीं चाहिए। 

लेकिन आज हम यही मूर्खता कर रहे हैं। 

अपनी इस संस्कृति को छोड़कर हम 

पाश्चात्य संस्कृति को पूरी तरह अपनाने 

पर उतारू हो रहे हैं। 

माना के समय के अनुसार चलना व 

परिवर्तित होना ज़रूरी है लेकिन ये 

परिवर्तन उन्नति और विकास के लिए 

होना चाहिए मगर हम तो ऐसा परिवर्तन 

पसंद कर रहे हैं जो हमारे पतन को 

निमंत्रण देने वाला है। 

पहले लिव इन रिलेशनशिप को कानूनी 

सहमति देना और अब समलैंगिक विवाह 

को अनुमति देने पर विचार 

-विमर्श करना।आख़िर कितना नीचे 

गिराएंगे हम अपनी संस्कृति को? कितना 

और पतित होंगे हम?

कुछ तो सोचिये!संभालिये देश को!

वरना संस्कृति नष्ट हो जाएगी।कुछ नहीं 

बचेगा। सिर्फ़ अफ़सोस बचेगा। 

इतना पतन नहीं देखा जाएगा सभ्य जनों 

से,संस्कृति और नैतिकता प्रेमियों से। 


भूल कर भी समलैंगिक विवाह पर 

सहमति मत होने दीजियेगा। पशुवत 

वृत्तियों को शय मत देने दीजिये।

 समलैंगिकता और लिव इन रिलेशनशिप 

ये दोनो ही विचारधारायें मानसिक बीमारी की उपज है.
कमज़ोर नैतिक चरित्र की माँग है इन्हे 

प्रोत्साहन की नहीं सुधार की जरूरत है.

नैतिक शिक्षा और आध्यात्मिक शिक्षा की जरूरत है। 

विवाह एक बहुत ही पवित्र संस्कार है 

हमारी भारतीय संस्कृति में.इसकी महत्ता 

धीरे-धीरे ख़त्म करके हमने  

समाज  में गंदगी ला दी है। लिवइन 

रिलेशनशिप को कैसे सहमति मिली मुझे 

तो उस पर भी आश्चर्य और अफ़सोस 

होता है। खुले आम समाज में इस तरह 

बुरे आचरण को सहमति देकर अगर ये 

उम्मीद की जाए कि समाज में 

नैतिकता और अनुशासन बना रहेगा तो ये बड़ी ही हास्यास्पद बात होगी। 

भगवान कृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है 
कि कुछ भी ग़लत होते हुए देखना उतना ही 

अनैतिक है जितना कि कुछ भी 

ग़लत करना। इसलिए एक के बाद एक 

आ रहे इन ग़लत विचारों,इन परिवर्तनों 

को स्वीकार मत कीजिये। जो ग़लत 

है उसे ग़लत कहना सीखिए। 

मत होने दीजिये संस्कृति को प्रदूषित और सभ्यता को पतित। 

जो विषय पूरी तरह अस्वीकार्य है 

आख़िर उस पर विचार होता ही क्यों है।

सहमति और असमति की बात तो दूर की चीज है.

दिमाग में ऐसी गंदगी आती ही क्यों है। 

भगवान राम और कृष्ण की इस पावन 

भूमि को इतना मलिन मत करो कि 

मर्यादित लोगों को यहाँ रहने में ही घुटन 

होने लगे। 

आखिर ऐसे विचार उत्पन्न कैसे दिमाग में 

होते हैं? इतनी खुराफात, इतने भटकाव 

वाले कौन लोग होते हैं।

क्या संयम और मर्यादा में रहना इतनी 

मुश्किल और गैर जरूरी है कि हम इनके 

अलावा सब अपनाने को तैयार है.

समलैंगिकता और लिव इन रिलेशनशिप 

ये दोनो ही विचारधारायें मानसिक बीमारी की उपज है.

कमज़ोर नैतिक चरित्र की माँग है इन्हे 

प्रोत्साहन की नहीं सुधार की जरूरत है.

नैतिक शिक्षा और आध्यात्मिक शिक्षा की जरूरत है। 

याद रखें-👇


"ऐसा मौन जो विनाश की ध्वनि पैदा करे उससे ज़्यादा भला है वो शोर जो सृजन की शांति पैदा करे'' .
-अंशु चौहान










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