भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें'


जिंदगी को हंस के जिओ. हर बात पे मुंह फुलाना या सीरियस होना जरूरी नहीं है मैं तो कहती हूं लड़ाई में भी हसी  खोजो.बीच में भाव बदल के चुटकुले सुनाने लगो.कह दो के लड़ने का मन नहीं है.कुछ और सुना...
सब दिमाग का खेल है मनोवृत्ति का खेल है.आपके हाथ में है क्यों दूसरे के खोपड़े के हिसाब से चलना. बाकी आपकी मर्जी..उसे चढाने दो त्यौरियां .तुम्हें प्रभावित ही नहीं होना है .तुम्हें ऐसा बन जाना है मानो सामने एक नादान बालक खड़ा है .

जब तक विषय कोई ज़्यादा गंभीर न हो ,जैसे देश ,धर्म और मर्यादा के ख़िलाफ़ कोइ बात ,तब तक किसी विषय पर ज़्यादा तमतमाने की ज़रूरत नहीं है .न्याय संगत बात के लिए,नैतिकता के लिए लड़ाई सही,बाकी सब व्यर्थ है.इसलिए मौन रहना सीखो,भीतर ही भीतर प्रभु का चिंतन कर प्रसन्न रहना सीखो.प्रभु प्रेम रस का पान करो फिर बाहर सब फीका और रस हीन लगेगा.भीतर की दुनिया में जीना सीखो।तब जान पाओगे बाहर कुछ भी नहीं है।कुछ भी सुंदर नहीं है।जहां आनंद खोज रहे हो है ही नहीं।शांत रहकर प्रभु में खोने का आनंद जिसने पाया उसे बाहर की चीज़ से कोई मतलब नहीं होता। इसलिये भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें बाहर तो कुछ भी सुंदर व स्थिर नहीं है .

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