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'योग' पहले भी आज भी

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आज के युग में 'योग' का कितना महत्व है ये समझाने की आवश्यकता नहीं है। अस्वस्थ खान-पान और ख़राब जीवन -शैली के प्रभाव से आज हर दूसरा - तीसरा व्यक्ति बीमारियों की चपेट में है। ऐसे में योग ही एक मात्र वो उपाय है जो हम सब को स्वस्थ बनाए रख सकता है। योग पद्दति की उपादेयता वैसे तो प्राचीन काल से ही रही है लेकिन आधुनिक युग में इसकी ज़रुरत अपरिहार्य है। योग - भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहें है। 'योग' एक ऐसी पद्दति है जिसमे शरीर ,मन और आत्मा एक -साथ जुड़ जाते हैं। योग गुरु बाबा रामदेव जी ने आधुनिक युग में इसकी जो महत्ता प्रतिपादित की है वो सराहनीय है। आज भारत में ही नहीं वरन अन्य देशों में भी 'योग' का महत्वपूर्ण स्थान है। अन्य देश भी इसके माध्यम से उत्तम स्वास्थ्य का लाभ ले रहे हैं। प्रधान -मंत्री नरेंद्र मोदी जी  ने योग की महत्ता को स्वीकार करते हुए ही '21 जून' को योग दिवस के रूप में मनाए जाने का प्रस्ताव रखा था जो पारित भी हो चुका  है। अब ये दिन योग दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज यदि हर व्यक्ति स्वयं को  मानसिक और शारीरिक रूप से निरोगी रखना चाह...

मुफ़लिसी

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मुफ़लिसी से परेशां मै भी हूँ तू भी है इन राहों पर क़दम तेरे भी है मेरे भी हैं   रख कर मेरे काँधे पर हाथ ,दोस्ती की क़सम ले ले  उस मंज़िल पर नज़र तेरी भी है मेरी भी है  चल आज अपने बस्तों में विश्वास की क़िताबें भर लें  बैग ख़ाली यूँ तो तेरा भी है मेरा भी है दोपहर के भोज की चिंता भी क्या करें हम ग़रीब  लंगर का ख़याल तुझे भी है मुझे  भी  है  ना तेरा कोई ठिकाना न मेरा कोई घर है  सड़कों के किनारे बिछौने की तलाश तुझे भी है मुझे भी है  उस 'रौशनी' में  रहने की तड़प कम नहीं होती ए दोस्त  इन अँधेरी गलियों से हैरान मै भी हूँ तू भी है।

'शिक्षण -संस्थाएँ और चिकत्सालय '

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शिक्षण -संस्थाएँ और चिकत्सालय दो ऐसी जगह हैं जहाँ से लोगों की उम्मीद ,उनका विश्वास और उनका भविष्य  जुड़ा होता है। ये वो जगह हैं जहाँ  किसी भी तरह का प्रलोभन या व्यक्तिगत स्वार्थ की वृत्ति यहाँ दाख़िल इंसान की  और उसके पूरे परिवार की ज़िंदगी को बर्वाद तक कर सकते हैं। शिक्षण संस्थाओं में अभिभावक अपने बच्चों को उज्ज्वल भविष्य हेतु प्रवेश दिलाते हैं।  अपने बच्चों के लिए सुनहरे सपने बुनते हैं।  इसके लिए वो कैसे भी करके इन स्कूलों की मोटी फीस भी चुकाते हैं। बच्चों की ख़ुशी के लिए वो अपने ख़र्चों में भी कमी कर देते हैं। ऐसे में इन संस्थाओं की ज़िम्मेदारी बनती है कि ये संस्थाएँ किसी भी प्रकार के प्रलोभन और स्वार्थ से ऊपर उठ कर अपने स्टूडेंट्स के भविष्य के बारे में सोचे। सभी विद्यार्थियों के प्रति निष्पक्ष रहें। स्कूल प्रशासन किसी भी तरह के लालच से ऊपर रहे। किसी भी तरह की  अनावश्यक शर्त  अपने विद्यार्थियों पर न थोपें।  ये संस्थाएँ  बच्चों के भविष्य पर फ़ोकस करें न कि अपनी संस्था के व्यावसायिक लाभ के प्रति।  यूनिफार्म या क़ित...