'शिक्षण -संस्थाएँ और चिकत्सालय '



शिक्षण -संस्थाएँ और चिकत्सालय दो ऐसी जगह हैं जहाँ से लोगों की उम्मीद ,उनका विश्वास और उनका भविष्य 

जुड़ा होता है।

ये वो जगह हैं जहाँ  किसी भी तरह का प्रलोभन या व्यक्तिगत स्वार्थ की वृत्ति यहाँ दाख़िल इंसान की  और उसके पूरे परिवार की ज़िंदगी को बर्वाद तक कर सकते हैं।
शिक्षण संस्थाओं में अभिभावक अपने बच्चों को उज्ज्वल भविष्य हेतु प्रवेश दिलाते हैं।
 अपने बच्चों के लिए सुनहरे सपने बुनते हैं। 

इसके लिए वो कैसे भी करके इन स्कूलों की मोटी फीस भी चुकाते हैं। बच्चों की ख़ुशी के लिए वो अपने ख़र्चों में भी कमी कर देते हैं। ऐसे में इन संस्थाओं की ज़िम्मेदारी बनती है कि ये संस्थाएँ किसी भी प्रकार के प्रलोभन और स्वार्थ से ऊपर उठ कर अपने स्टूडेंट्स के भविष्य के बारे में सोचे। सभी विद्यार्थियों के प्रति निष्पक्ष रहें।

स्कूल प्रशासन किसी भी तरह के लालच से ऊपर रहे। किसी भी तरह की  अनावश्यक शर्त  अपने विद्यार्थियों पर न थोपें।  ये संस्थाएँ  बच्चों के भविष्य पर फ़ोकस करें न कि अपनी संस्था के व्यावसायिक लाभ के प्रति।  यूनिफार्म या क़िताबों को स्कूल से ही महँगे दामों में ख़रीदने की बाध्यता समाप्त होनी चाहिए। यदि अभिभावक वही पुस्तकें किसी सस्ती जगह से या स्थानीय विक्रेताओं से खरीद सकते हैं तो उन्हें प्रतिबंधित न करें। इन्हे  शिक्षा बोर्ड के नियमों का पालन करना चाहिए। विद्यार्थियों  में अपने बच्चों की छवि देखकर उसी  अनुरूप उनके भविष्य की चिंता करनी चाहिए।


इसी तरह चिकित्सालयों में भी मरीज के प्रति चिकित्सक का महत्वपूर्ण दायित्व बनता है कि वह निष्पक्ष और उदार होकर मऱीज़  का इलाज़ करे। किसी भी प्रकार के लालच में आकर मऱीज की जिंदगी से खिलवाड़ न करें।

चिकित्सा पेशे से जुड़े लोग कई  सालों से एक 'हिपोक्रेटिक ओथ 'लेते आ रहे हैं जिसमें हर डॉक्टर आर एक्स  (rx )लिखकर ये शपथ दोहरता है -'मै अपोलो ,पीड़ा हरने वाले ,आँसुओं को पोछने वाले ,तत्काल निरोगी करने वाले और रामबाण औषधि सृजित करने वाले की शपथ लेता हूँ कि अपनी सम्पूर्ण क्षमताओं के साथ रोगी के कष्ट हरने के लिए तत्पर रहूँगा। मै किसी भी घर में प्रवेश करता हूँ या कोई मेरे पास आता है तो इसका मक़सद मेरे रोगियों की भलाई ही होगी। मै शपथ लेता हूँ कि मै अपने आप को सभी तरह की दुरेच्छाओं से दूर रखूँगा और कभी किसी रोगी का बुरा न तो सोचूँगा और न ही जहाँ तक मेरी सामर्थ्य है होने दूँगा'।यदि इस शपथ को हर चिकित्सक दिल से ग्रहण कर ले तो चिकित्सालयों में हर मरीज़ की ज़िंदगी सुरक्षित हो जाएगी। और चिकित्सकों को जो भगवान का दर्ज़ा दिया जाता है वो भी सार्थक हो जाएगा।

एक चिकित्सक का मृदु और स्वार्थरहित व्यवहार मरीज़ को एक ऊर्जा प्रदान करता है जो उसे जल्द ठीक करने में मदद करता है। किसी भी डॉक्टर को अपने क्षुद्र लाभ के लिए मरीज़ के महत्वपूर्ण जीवन को दाव पर लगाने का हक़ नहीं है।
हो सकता है की चिकित्सक  के लिए उस मरीज़ की ज़िंदगी का कोई खास मोल नहीं हो पर उसके परिजनों के लिए वो पूरी दुनिया होता  है।





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