मुफ़लिसी
मुफ़लिसी से परेशां मै भी हूँ तू भी है
इन राहों पर क़दम तेरे भी है मेरे भी हैं
रख कर मेरे काँधे पर हाथ ,दोस्ती की क़सम ले ले
उस मंज़िल पर नज़र तेरी भी है मेरी भी है
चल आज अपने बस्तों में विश्वास की क़िताबें भर लें
बैग ख़ाली यूँ तो तेरा भी है मेरा भी है
दोपहर के भोज की चिंता भी क्या करें हम ग़रीब
लंगर का ख़याल तुझे भी है मुझे भी है
ना तेरा कोई ठिकाना न मेरा कोई घर है
सड़कों के किनारे बिछौने की तलाश तुझे भी है मुझे भी है
उस 'रौशनी' में रहने की तड़प कम नहीं होती ए दोस्त
इन अँधेरी गलियों से हैरान मै भी हूँ तू भी है।

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