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पुत्र और पुत्री संग हो समान व्यवहार '

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हम अक्सर हर क्षेत्र में समानता की बात करते  हैँ परंतु हर वक्त एक ग़लती कर बैठते हैँ .हम एक पक्ष विशेष की श्रेष्ठता प्रतिपदित  करने हेतु ,उसके अधिकारों की  रक्षा  हेतु  दूसरे  को हीन और असुरक्षित बना देते हैँ.उदाहरण के लिए हमारे समाज में जब बेटे की स्थिति उच्च थी, तो बेटी  की निम्न थी .उस असमानता से  जब  मन व्यथित हुआ तो हमने बेटियों के हित  हेतु ,उनकी  महत्ता  स्थापित  करने  हेतु  प्रयास  और  प्रचार  करने  शुरू  किए .लडकों की  महत्ता लड़कियों से निम्न  बताने  की  कोशिश  की गई ,विभिन्न विडियो और विज्ञापन  के माध्यम  से .परिणाम स्वरूप  फिर असमानता  पैदा  हो  गई  है .कई जगह लड़कों के साथ लड़कियों की अपेक्षा कम  स्नेह पूर्ण  या अति  पक्षपात पूर्ण  व्यवहार  किया  जा  रहा  है. जब  बात  समानता  की  करनी  है तो व्यवहार  भी  दोनों  के  साथ  समान...

चन्दलई लेक (जयपुर)

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जयपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर चन्दलई झील है .काफी खूबसूरत झील है ये. लेकिन सफाई  की व्यवस्था  यहाँ चरमराई हुई  है.साथ ही आस -पास  फैली बेतरतीब झाड़िय़ाँ सोचने पर मज़बूर कर देती  हैँ .अगर इस स्थान पर  थोड़ा ध्यान दिया जाए  और  इसके  विकास  के  हेतु  कुछ  सोचा जाए तो ये बहुत सुन्दर टूरिस्ट प्लेस के रूप  में  विकसित हो सकता है .मैं  जानती हूँ कि इस विषय पर    समाचार पत्रों मेँ पहले भी काफी  कुछ प्रकाशित किया जा चुका है. मगर तब तक मैने इस स्थान को  विजिट नहीं किया था .लेकिन अभी एक दो दिन पहले जब मै यहाँ पहुँची तो मैने पाया की ये एक खूबसूरत झील हैँ .अगर कुछ प्रयास किए जाएं तो ये बिना किसी संदेह के बहुत  खूबसूरत भ्रमण स्थल बन  सकता हैँ .यहाँ की झाड़ियों की  कटिंग कर दी जाए, चारों तरफ का क्षेत्र साफ करके बेरिकेडिंग कर दी जाए ,बेंचेज लगा दी  जाएं ,बोटिंग की व्यवस्था कर दी जाए ,पानी की स्वच्छता  बनाए रखने हेतु कुछ सोचा  जाए ,साथ ही आस -पास कुछ -एक दूरी पर छोटी -छोटी खान...

'नन्ही दुलारी '

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पापा के काँधे पर रख सिर ,वो जाने कब सो जाती थी आँख खुले तो माँ फिर उसको ,लोरी गा के सुलाती थी जिसके हँसने पर खुश होते ,रोने पर मुर्झाते थे अपने सब सपनों की बलि वो, जिसके लिए चढ़ाते थे सोच -सोच आज चिंतित हैं बैठे हो कर सयानी कैसे गुज़रेगी ,दहशत भरी उन राहों से जहाँ डगर -डगर पर मैले मन का,हर एक अमानुष बैठा है | स्नेह -दुलार से पली -बढ़ी ये ,कैसे जग की कुटिल चाल पढ़ पाएगी नाज़ुक मन ,कोमल शरीर से ,दुष्टों का कैसे वध कर पाऐगी जहाँ कन्या से लेकर वृद्धा तक की ,अस्मत को ही ख़तरा हो उस धरा पर नामुमकिन है कन्या -अभिभावक, दुश्चिंताओं से मुक्त रहें अब चिंता बेटी के मात-पिता  की ,अपनी चिंता बनालो वरना पाप ,अधर्म का खुद को ,भागीदार कहला लो नन्ही -नन्ही कलियाँ भी  जहाँ, पशु पैरों से  रोंदी जाऐगी उस गुलशन की फुलवारी का,संरक्षण आख़िर कैसे होगा हुआ  नारी मन पीड़ित ज़रा भी ,अभिशापित पूरा जगत होगा | | - ...