पुत्र और पुत्री संग हो समान व्यवहार '
हम अक्सर हर क्षेत्र में समानता की बात करते हैँ परंतु हर वक्त एक ग़लती कर बैठते हैँ .हम एक पक्ष विशेष की श्रेष्ठता प्रतिपदित करने हेतु ,उसके अधिकारों की रक्षा हेतु दूसरे को हीन और असुरक्षित बना देते हैँ.उदाहरण के लिए हमारे समाज में जब बेटे की स्थिति उच्च थी, तो बेटी की निम्न थी .उस असमानता से जब मन व्यथित हुआ तो हमने बेटियों के हित हेतु ,उनकी महत्ता स्थापित करने हेतु प्रयास और प्रचार करने शुरू किए .लडकों की महत्ता लड़कियों से निम्न बताने की कोशिश की गई ,विभिन्न विडियो और विज्ञापन के माध्यम से .परिणाम स्वरूप फिर असमानता पैदा हो गई है .कई जगह लड़कों के साथ लड़कियों की अपेक्षा कम स्नेह पूर्ण या अति पक्षपात पूर्ण व्यवहार किया जा रहा है. जब बात समानता की करनी है तो व्यवहार भी दोनों के साथ समान होना चाहिए .किसी एक पक्ष को जब ज़्यादा महत्त्व देने की बात होगी तो समानता कहाँ रहेगी ?फिर भाई -बहन का आपसी स्नेह भी कम हो जाएगा और माँ -बाप के प्रति दोनों की सोच भी पक्षपात पूर्ण हो जाएगी .आप अगर बेटी के प्रति ज़्यादा स्नेह भाव दर्शाएँगे तो बेटा असुरक्षित महसूस करेगा और यदि बेटे के प्रति ज़्यादा दिखाएंगे तो बेटी .इसलिए समान व्यवहार की मानसिकता अपनानी होगी .अन्यथा इस असमान व्यवहार के परिणामों का सामना बाद में आपको ही करना पड़ेगा .
इसी तरह आरक्षण का विषय है .आरक्षण भी समानता की बात नहीं करता वरन किसी एक पक्ष को दूसरे से अलग महत्ता देकर , अलग कर देता है . ये समानता नहीं वरन आपसी भेद और अलगाव पैदा करता है .झगड़े बढ़ाता है .समानता के अधिकार पर भी चोट करता है .सभी को अपनी -अपनी योग्यता के अनुसार पद अर्जन की बात पर जोर दिया जाए .किसी भी आधार पर भेद या अनुचित संरक्षण की बात न की जाए तभी हर क्षेत्र में समानता का उद्देश्य पूरा होगा .
-अंशु चौहान

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