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'मै 'से परे ही ईश्वर हैं

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'मैं' अपने आप में एक बहुत ही छली  शब्द है.इसका कोई अर्थ है ही नहीं  क्योंकि शरीर तो आत्मा से चल रहा है  और आत्मा के शरीर से बाहर आते ही  सम्पूर्ण शरीर  का अस्तित्व ही समाप्त  हो जाता है.तो आत्मा ही मूल हुई. आत्मा ही ईश्वर है. ईश्वर ही प्रमुख हुए। फिर व्यर्थ का अहम्, व्यर्थ का भ्रम नहीं  पालना चाहिए की आप सब कर रहे हैं  क्योंकि आप कुछ भी करने लायक रहेंगे  या नहीं ये भी ईश्वर ही निश्चित करेंगे। आपकी हर सांस उसके हाथ में है। आपका प्रारब्ध व आपके आज के कर्म  ही आपका वर्तमान और भविष्य निर्धारित करते हैं. कर्म अच्छे हैं तो आपकी बुद्धि पवित्र  योजनाएं बनायेगी.अच्छे निर्णय  करवाएगी वरना गलत कर्म,गलत योजना  और निर्णय के लिए आपकी बुद्धि प्रेरणा  देगी जो आपके भविष्य के लिए घातक  होगी.धन, संपदा का आना या भौतिक  इच्छा पूरी होना सुख नहीं है।पवित्र बुद्धि  होना और हर कर्म पवित्र भाव लेकर  करना भविष्य के लिए सुख की गारंटी हो  सकती है।इसलिए 'मै' को नही भीतर  बैठे  प्रभु को ध्यान रख कर कर्म करें....

'परवरिश'

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मां -बाप के लिये बच्चों की परवरिश एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है लेकिन आज कल लोग इसे बहुत हल्के में लेते हैं। माँ-बाप की इस लापरवाही वृत्ति से ही अक्सर उनके बच्चे पथभ्रष्ट हो जाते हैं .उनका आचरण बिगड़ जाता है.वो  मनमानी करने लगते हैं.सही ग़लत की समझ न होने से कुछ भी ग़लत करने से नहीं डरते हैं. कई बार तो माँ बाप खुद ही इतने विवेकशून्य होते हैं कि वो बच्चों को सही और ग़लत का फर्क ही नहीं समझा पाते  हैं क्योंकि उन्हे खुद ही नैतिकता का ग्यान नहीं होता है या आधुनिक या दबंग बनाने की होड़ में वो अपनी संतान  को एकदम संस्कारहीन या बेहुदा बना डालते हैं. उनकी ये लापरवाही बाद में उनके लिये तो हानिकारक सिद्ध होती ही है साथ ही पूरे समाज के लिए भी घातक हो  जाती है.समाज में मूर्ख और अपराधी वर्ग ऐसे ही लोग तैयार कर देते हैं जो बच्चों की सही परवरिश नहीं करते. बच्चों को डॉक्टर ,इंजीनियर बना देना इतनी बड़ी बात नहीं होती जितना कि उन्हे संस्कारवान और मर्यादित  आचरण वाला बनाना.अच्छे संस्कार नहीं दिये जायें तो पीढ़ी दर पीढ़ी बेकार फसल ही तैयार होती  है.कुंठाग्रस्त,बिगढ़ैल मानसिकता का व्यक्त...

वास्तविक सुख

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ईश्वर का ज़िंदगी में आगमन एक उत्सव की तरह होता है।जैसे एक नवयुवती या नवयुवक जिनका विवाह तय होता  है वह अपनी होने वाली ससुराल  को लेकर जितने  उत्सुक और हर्षित होते  हैं  ठीक वैसे ही एक भक्ति में आने  वाला व्यक्ति अपने प्रभु या उस आध्यात्मिक लोक के प्रति दीवाना होता है।बस बड़ा अंतर ये होता है कि सांसारिक  रिश्तेदारी या ससुराल   में सुख मिलेगा या दुःख इसकी कोई गारण्टी नहीं होती पर प्रभु से रिश्तेदारी में परम सुख  और विश्वास ज़रूर मिलता है।एक ऐसा सुख जिसे पाकर फिर कुछ पाने की चाह नहीं रहती।  जिसके बाद सब तलाश खत्म हो जाती है। जिसको पाकर सब तृष्णाएं मिट जाती हैं।   एक संपूर्णता का अहसास होने लगता है। बस यही होता है वो सुख तो जो तुम्हें पाना था। यही थी जिंदगी की प्रथम  और अंतिम खोज,जिसकी शुरुआत जीवन के आरंभ से ही की जानी चाहिए थी पर नहीं की गई कोई कोशिश.  'कोरोना' मे पूरी दुनिया ने जिस प्रभु को भरपूर  याद किया था मगर फिर सब सामान्य होते ही सहजता से भुला  दिया। उस समय तो हर व्यक्ति बड़ी बड़ी बातें कर रहा था अध्यात्...