'परवरिश'





मां -बाप के लिये बच्चों की परवरिश एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है लेकिन आज कल लोग इसे बहुत हल्के में लेते हैं।

माँ-बाप की इस लापरवाही वृत्ति से ही अक्सर उनके बच्चे पथभ्रष्ट हो जाते हैं .उनका आचरण बिगड़ जाता है.वो 

मनमानी करने लगते हैं.सही ग़लत की समझ न होने से कुछ भी ग़लत करने से नहीं डरते हैं.

कई बार तो माँ बाप खुद ही इतने विवेकशून्य होते हैं कि वो बच्चों को सही और ग़लत का फर्क ही नहीं समझा पाते 

हैं क्योंकि उन्हे खुद ही नैतिकता का ग्यान नहीं होता है या आधुनिक या दबंग बनाने की होड़ में वो अपनी संतान 

को एकदम संस्कारहीन या बेहुदा बना डालते हैं.

उनकी ये लापरवाही बाद में उनके लिये तो हानिकारक सिद्ध होती ही है साथ ही पूरे समाज के लिए भी घातक हो 

जाती है.समाज में मूर्ख और अपराधी वर्ग ऐसे ही लोग तैयार कर देते हैं जो बच्चों की सही परवरिश नहीं करते.


बच्चों को डॉक्टर ,इंजीनियर बना देना इतनी बड़ी बात नहीं होती जितना कि उन्हे संस्कारवान और मर्यादित 

आचरण वाला बनाना.अच्छे संस्कार नहीं दिये जायें तो पीढ़ी दर पीढ़ी बेकार फसल ही तैयार होती 

है.कुंठाग्रस्त,बिगढ़ैल मानसिकता का व्यक्ति कभी अपनी संतान को अच्छे संस्कार नहीं दे सकता इसलिये खुद का 

संस्कारित और संयमित होना,नैतिक होना बहुत ज़रूरी है.

आजकल माँ बाप बच्चों को सिर्फ मौज मस्ती करने की सीख देते हैं। तेज आवाज में म्यूजिक सुनते हुए, तेज स्पीड 

से गाड़ी चलाना लोग इसे आधुनिकता ,स्वतंत्रता,रुआव समझते हैं किसी भी कीमत पर बस life enjoy करो.क्या 

नैतिक है क्या अनैतिक ये कोई नहीं सिखाता.हुक्का पियो, सिग्रेट शराब पियो,किशोर-किशोरी कहीं  भी किसी के 

साथ घूमो, रुको या कैसा भी अनैतिक आचरण करो। बस उनको लगता है कि बच्चे खुश रहने  चाहिए।

मेरी दृष्टि में या किसी भी सभ्य इंसान की दृष्टि में ये सबसे गलत परवरिश है.बच्चों की ख़ुशी बेशक ज़रूरी है मगर 

वो नैतिक कर्म से अर्जित होनी चाहिए.पवित्र आचरण के साथ-साथ होनी  चाहिए. 

आज समाज में अपराधी तत्त्वों की अधिकता इसी कारण हो गई है कि व्यक्ति गलत हो या सही बस किसी भी तरह 

से मौज मस्ती करना चाहता है। धन लोलुपता  और भोग-वृत्ति  का भाव है बस .व्यक्तित्व से इंसानियत व सौम्यता 

गायब है।राक्षस बन रहे हैं और बना रहे हैं बस.

 

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