वास्तविक सुख
ईश्वर का ज़िंदगी में आगमन एक उत्सव की तरह होता है।जैसे एक नवयुवती या नवयुवक जिनका विवाह तय होता
है वह अपनी होने वाली ससुराल को लेकर जितने उत्सुक और हर्षित होते हैं ठीक वैसे ही एक भक्ति में आने
वाला व्यक्ति अपने प्रभु या उस आध्यात्मिक लोक के प्रति दीवाना होता है।बस बड़ा अंतर ये होता है कि सांसारिक
रिश्तेदारी या ससुराल में सुख मिलेगा या दुःख इसकी कोई गारण्टी नहीं होती पर प्रभु से रिश्तेदारी में परम सुख
और विश्वास ज़रूर मिलता है।एक ऐसा सुख जिसे पाकर फिर कुछ पाने की चाह नहीं रहती।
जिसके बाद सब तलाश खत्म हो जाती है। जिसको पाकर सब तृष्णाएं मिट जाती हैं।
एक संपूर्णता का अहसास होने लगता है। बस यही होता है वो सुख तो जो तुम्हें पाना था। यही थी जिंदगी की प्रथम
और अंतिम खोज,जिसकी शुरुआत जीवन के आरंभ से ही की जानी चाहिए थी पर नहीं की गई कोई कोशिश.
'कोरोना' मे पूरी दुनिया ने जिस प्रभु को भरपूर याद किया था मगर फिर सब सामान्य होते ही सहजता से भुला
दिया। उस समय तो हर व्यक्ति बड़ी बड़ी बातें कर रहा था अध्यात्म और दर्शन की। शरीर हाड- मांस इत्यादि की..
'कोविड ' का वो दौर था जहां हर व्यक्ति दार्शनिक हो गया था।देह भाव से ऊपर उठकर खुद को आत्मा स्वरूप
समझकर जी रहा था।जीवन का व्यापक अर्थ समझने लगा था .
आज फिर सब कुछ समान्य होते ही हम फिर भौतिक चकाचौध की तरफ दौड़ने लगे हैं।भूल गए वो दौर जिसमें हर
सगा रिश्ता भी बीमार व्यक्ति के नजदीक जाने से डर रहा था। मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार तक कोई नहीं कर
रहा था खुद के बीमार होने के डर से। भगवान ने खूब समझाने की कोशिश की कि दुनिया में मेरे अलावा कोई सगा
नहीं है तुम्हारा मगर हम ना तब समझे न अब समझ रहे हैं। ये है हमारी ढीठता की हद। हम ढीठता पर कायम
रहते हैं चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाये। सब छोड़ देंगे मगर अड़ियलपन नहीं। अध्यात्म हमें ढकोसला
लगेगा,भक्ति पागलपन और माया से भरी सब चीज़ें कल्याणकारी लगेंगी।फिर दुःख आते ही लगेंगे रोने-पीटने और
ख़ुशी आते ही एक पैग लगाले .. । हे भगवान क्या करें ऐसे मूर्ख गणों का.?
तभी तो कहा जाता है कि "दुख में सुमिरन सब करें सुख मे करे ना कोय,
जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होय।
पर इंसान की फितरत है सुख में प्रभु को भूलने की और दुःख में फिर खूब शिक़ायत करने की.
इसलिए भगवान भी छोटे बड़े झटके लगाते रहते हैं control मे रखने के लिए.
तो संभल जाइये !भगवान को समर्पित हो जाइये.
ईश्वर के प्रति समर्पण में जो सुख मिलेगा वो कहीं नहीं है।माया से प्रभावित ये आपका मन प्रभु से विमुख
हो फालतू चीज़ों में सुख ढूंढ रहा है,असली सुख को छोड़ कर. ये भौतिक समपन्नता हर वक्त बनी रहे ये ज़रूरी
नहीं है। जब नहीं रहेगी तो टूट जाओगे और जितने समय बनी रहेगी पैर धरातल पर नहीं रहेंगे और ईश्वर विमुख
रहोगे।
अब ईश्वर से जुड़ने का मतलब भी कुछ लोगों को स्पष्ट नहीं होता है। वो समझते हैं कि मंदिर जाना ,पूजा
दिया -बाती कर लेना ही आध्यत्मिकता और भक्ति है। नहीं जी !मंदिर न भी जाओ ,पूजा न भी करो मगर मन हर
कार्य को करते हुए प्रभु चरणों में लगा है तो आप भक़्त हो। एक के बाद एक इच्छाएं प्रभु के सामने रखे जा रहे हो
और पूरी होने पर भगवन के आगे शीश नवा रहे हो ,उनका आभार व्यक्त कर रहे हो और ज़रा सा दुःख मिलते ही
गाली -गलौच और उन पर सवाल उठा देना ये कदापि भक्ति नहीं है।सच्ची भक्ति और प्रेम तो वो है जो अपने प्रेमी
(ईश्वर )से दुःख या सुख कुछ भी मिलने पर भीतर से उसे प्यार करता ही रहे। तभी सच्चा समर्पण कहलायेगा।जिस
तरह एक माँ(सच्चे अर्थों में मां)अपनी संतान से ऊपर से क्रोध करते हुए भी भीतर ही भीतर उसकी चिंता करती है,
उसका हित चाहती है। उसी तरह हमें प्रभु की हर लीला को समझना चाहिए और उनके प्रति समर्पित रहना
चाहिए।भक्ति का अर्थ ये नहीं कि प्रभु तुम्हें भौतिक सुख सुविधाएं देंगे।नहीं !वो तुम्हे ख़ुद से जोड़कर इतना निर्भीक
और आनंदित बना देंगे कि और कहीं सुख नहीं मिलेगा,आनंद नहीं मिलेगा।विपरीत परस्थिति में दुःख का अहसास
कम कर देंगे या बिल्कुल नहीं होने देंगे। इसलिए ही तो प्रभु से जुड़ा व्यक्ति न तो दुःख में ज़्यादा दुखी होता है और
न ही सुख में ज़्यादा सुखी। इसलिए अनुकूल -प्रतिकूल परस्थिति में स्वं को संयत बनाये रखने के लिए प्रभु से जुड़े
रहिये। भटकना छोड़ें और असली सुख प्राप्त करें।मानसिक रूप से सशक्त बनने के लिए ईश्वर और अध्यात्म से जुड़ना अति आवश्यक है .

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