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पति-पत्नी का रिश्ता

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पति-पत्नी का रिश्ता कहते हैं दो आत्माओ का रिश्ता होता है। इस रिश्ते को अगर वफ़ा और निष्ठा के साथ निभाया जाए तो सबसे अच्छा रिश्ता है जो वृद्धावस्था में सबसे ज्यादा आत्मिक हो जाता है .भारतीय संस्कृति में तो पति को देवता माना जाता है .मगर ये ध्यान रखने योग्य बात है कि उसी पति को परमेश्वर माना जाता है जो चरित्र से अच्छा हो, व्यभिचारी को नहीं।एक पत्नी व्रती पति और पतिव्रता स्त्री का स्थान तो देवताओं की दृष्टि में भी उच्च होता है। भारतीय संस्कृति का सम्मान करने वाले तो इसे मानते भी हैं लेकिन आजकल पाश्चत्य सभ्यता से प्रभावित लोग इस रिश्ते की अहमियत भूल गए हैं, इसलिए छोटी-छोटी बातों में तलाक जैसी स्थिति आ जाती है दोनो ही पक्ष अगर प्यार और सम्मान की भावना रखते हुए रिश्ता निभाए तो इस रिश्ते की ऐसी दुर्दशा ना हो.आख़िर अन्य toxic रिश्ते भी तो हम निभाते ही हैं .पति-पत्नी के रिश्ते में तलाक का विकल्प होता है, इसलिए हम इस में सहनशीलता नहीं दिखाते। बस बात-बात में तलाक का विकल्प तलाशने लगते हैं.इसलीये अन्य रिश्तों की तरह इसे भी सही से निभाएं विकल्प ना ढूंढे।पति या पत्नी व्याभिचारी हो तो त्याग देना चाहि...

उद्देश्य हीन मनुष्य

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कहते हैं ये मनुष्य जन्म इतना दुर्लभ है कि देवता भी इसके लिए तरसते हैं पर मनुष्य इतना मूर्ख है कि इसका महत्व ही नहीं समझ पा रहा है.ईश्वर प्राप्ति के लिए ही प्रभु मनुष्य योनि प्रदान करता है और मनुष्य पर माया का ऐसा जादू चढ़ता है कि प्रभु के अलावा सारी चीजों में उसकी रुचि होती है, सारे काम उसे ज्यादा जरूरी होते हैं प्रभु के अलावा. कोई विवेकशील व्यक्ति ही समझ पाता है उद्देश्य  को, जीवन के महत्व को.यहां लोग ऐसी व्यवस्था करने में लगे हैं जैसे यहीं स्थाई ठिकाना रहने वाला है .जबकी सब जानते हैं कि जगत में कोई स्थायी नहीं है। फ़िर भी लगे हुए हैं सोना-चाँदी एकत्र करने में,मकान पे मकान बनाने में।इच्छाए इतनी ज्यादा है कि कोई भी इंसान प्रभु से प्रभु को नहीं मांगता बल्की धन दौलत ही मांगता रहता है।इच्छा पूरी होते ही फूला नी समाता और कुछ इच्छा के विरुद्ध हो जाए तो गालियां देना शुरू कर देता है।   जीवन के प्रति तो इतना मोह है कि बुढ़ापे के चरम पर पहुंच कर भी पैसे के हिसाब -किताब में लगा रहता है.बच्चे,फिर बच्चों के बच्चे, फिर उनके भी बच्चों को देखने की तमन्ना मे ईश्वर से और अधिक उम्र की कामन...

भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें'

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जिंदगी को हंस के जिओ. हर बात पे मुंह फुलाना या सीरियस होना जरूरी नहीं है मैं तो कहती हूं लड़ाई में भी हसी  खोजो.बीच में भाव बदल के चुटकुले सुनाने लगो.कह दो के लड़ने का मन नहीं है.कुछ और सुना... सब दिमाग का खेल है मनोवृत्ति का खेल है.आपके हाथ में है क्यों दूसरे के खोपड़े के हिसाब से चलना. बाकी आपकी मर्जी..उसे चढाने दो त्यौरियां .तुम्हें प्रभावित ही नहीं होना है .तुम्हें ऐसा बन जाना है मानो सामने एक नादान बालक खड़ा है . जब तक विषय कोई ज़्यादा गंभीर न हो ,जैसे देश ,धर्म और मर्यादा के ख़िलाफ़ कोइ बात ,तब तक किसी विषय पर ज़्यादा तमतमाने की ज़रूरत नहीं है .न्याय संगत बात के लिए,नैतिकता के लिए लड़ाई सही,बाकी सब व्यर्थ है.इसलिए मौन रहना सीखो,भीतर ही भीतर प्रभु का चिंतन कर प्रसन्न रहना सीखो.प्रभु प्रेम रस का पान करो फिर बाहर सब फीका और रस हीन लगेगा.भीतर की दुनिया में जीना सीखो।तब जान पाओगे बाहर कुछ भी नहीं है।कुछ भी सुंदर नहीं है।जहां आनंद खोज रहे हो है ही नहीं।शांत रहकर प्रभु में खोने का आनंद जिसने पाया उसे बाहर की चीज़ से कोई मतलब नहीं होता। इसलिये भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें बाहर तो कुछ भ...