'प्रकृति के आग़ोश में '
ये तुम्हारे आगोश में आने की छटपटाहट है
जिसने मेरा सुकूँ छीना है
मै तुम्हारी हर शय के मोह पाश में बंधी हूँ
तुम्हारे ये निर्मल जल-धार वाले झरने
निःस्वार्थ भाव से बहती ये चंचल नदी
दृढ़ -भाव से खड़े शक्ति -संपन्न ये पहाड़
मुझे इतना लुभाते हैं कि मै समग्र समर्पण कर
इनके सानिध्य में ही बस जाना चाहती हूँ
वाहनों के तीखे स्वर ,विषैले धुँए की घुटन
मुझे अब व्याकुल करते हैं
वो पक्षिओं का कलरव ,पेड़ -पौधों की शीतल छाया
फूलों की मंद-मंद मुस्कान ,मुझे अपना गुलाम बना रहे हैं
बस तुम्ही तो हो जिसके आगे मै झुककर
स्वं को गौरवान्वित महसूस करती हूँ
तुम मेरे अंदर जो ऊर्जा का संचार करती हो
उससे मेरी उदासी दूर हो जाती है
और मै खिल उठती हूँ तुम्हारी गोद में
एक नन्हें बच्चे की तरह तृप्त होकर।।

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