क़िस्मत अगर अच्छी हों तो किसी भी योनि में जीव सुख भोग सकता है। अन्यथा इंसान होकर भी कुछ सुख या सम्मान अर्जित नहीं कर सकता।  एक तरफ़ ग़रीबी की मार सहते, बीमारी से ग्रसित मनुष्य और दूसरी तरफ़  अपने मालिक की गाड़ियों में सैर-सपाटा करते ,मन -पसंद खाना खाने वाले वो कुत्ते। ये सब किस्मत का ही तो फ़र्क है। क़िस्मत अच्छी हो तो सड़क के आवारा कुत्ते भी  एक अपनत्व भरा नाम पाकर सम्मानित व स्थापित बन जाते हैं ।

जयपुर के इस  आवारा कुत्ते की क़िस्मत उन कई कंगाल ,बदहाल इंसानों से  बहुत ज़्यादा अच्छी थी जिन्हे सड़को पर ,रेल की पटरियों पर कोई भी गाड़ी कुचल कर चली जाती है। जो भूख से तड़प कर या किसी बीमारी से परेशान होकर अपने प्राण त्याग देते हैं। जिन्हे संभालने वाला या सहारा देने वाला कोई हाथ आगे नहीं बढ़ता। 


फ़्रांस की रिसर्च स्कॉलर मरियम ने जयपुर के आवारा कुत्ते की किस्मत को कुछ इस तरह सँवारा कि दिमाग ये सोचने को मज़बूर हो जाता है  कि इंसान की योनि कुत्ते की योनि से श्रेष्ठ कैसे है? फ़्रांस की मरियम ने इस कुत्ते के ईलाज़ पर 7 लाख रूपए खर्च किए ,अपनी पढाई के बीच समय निकल कर इसकी सभी जाँच करवाई और फ़्रांस सरकार से इसे अपने साथ ले जाने की अनुमति के लिए अपने सारे प्रयास किए । अब ये  सड़क का आवारा कुत्ता नहीं रहा वरन मरियम का एक प्यारा दोस्त है जिसे 'मिठाई' नाम देकर ,व अपनाकर मरियम ने  सम्मानित सदस्य बना दिया है। 


आज के दौर में जहाँ रिश्तों में आत्मीयता ख़त्म सी हो गई है। जहाँ बेटे की चाह या फिर समाज के भय से कुछ माताएँ अपने बच्चोँ को लावारिस सड़क पर छोड़ कर जा रही हैं।  जहाँ बृद्धाश्रम में बुज़ुर्गों की संख्या  दिन व दिन बढ़ती जा रही है।  जहाँ हर रिश्ता स्वार्थ पर आधारित होता जा रहा  है। वहाँ इस तरह की घटना एक चमत्कारिक, अविश्वसनीय और  मानवीयता का श्रेष्ठ उदाहरण है। 







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