चाँद ,बारिश ,और चाँदनी
गर्मी से परेशान चाँद भी ,बाट जोह रहा बादल की
शीतलता को तभी बढ़ाऊँ ,मेहर हो जब कुछ सावन की।
गौरी के सुन्दर मुखड़े को मेरी उपमा, देते रहे हैं सभी कविगण
गढ़ न पाएँगे कोई कविता ,हुई जो सूरत काजल सी।
कुछ बूंदों का करूँ आचमन,तन पर रख लूँ चादर ठंडे बादल की
हो मतवाला खेलूँ लुकाछुपी ,ढूँढे चाँदनी मतवाली सी।
मेरी चाँदनी में प्रेमी -गण ,गढ़ें कहानी ख़्वाबों की
दो पल उनके साथ रहूँ फिर ,दूँ थोड़ी तन्हाई भी।
अपनी चाँदनी को लेकर मै जाऊँ ,ले कुछ बूँदे बारिश की
उसे भिगो दूँ ,कह भी दूँ ये ,तुम धुली -खिली सी रूपमती इस पागल की।
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